Saturday, 14 February 2015

Pasa palat gaya

पासा पलट गया 
‘‘सर, सर, महात्मा गाँधी रोड पर बैंक डकैती हो गई ..., तीन-चार गार्ड घायल हैं ..., अपना ही एरिया है ..., वायरलेस पर एस.पी. साहब की आवाज भी सुनाई पड़ रही थी...।’’
एक सिपाही के द्वारा तेजी से झकझोरे जाने से थानेदार साहब हड़बड़ाकर उठे।
लम्बा कद, गोरा रंग, घँुघराले बाल और आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थानेदार श्री प्रद्युमन ठाकुर की मुख्य रूचि तो साहित्य में थी। हिन्दी में एम.ए. करने के बाद कई कालेजों में व्याख्याता पद पाने का प्रयास किया, पर सारे पद विभागाध्यक्षों के भाई-भतीजों के लिए आरक्षित किए जा चुके थे। भला हो सरकार के द्वारा पुलिस में थोक में की जा रही बहालियों की, कि ठाकुर साहब को थानेदार की नौकरी मिल गई। इन्सान की किस्मत उसे कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है...! कहाँ साहित्य की सरल, श्रृंगारिक मानसिकता और कहाँ पुलिस की तिकड़म भरी नौकरी। ‘कि जिन्दगी इन्सान को बहुत कुछ सिखाती है’ और ‘थानेदार ठाकुर साहब ने जिन्दगी जीने और नौकरी करने के गुर तेजी से सीख लिए थे,’ यह बताने के लिए उस दिन की घटनाएँ ही पर्याप्त होगी ...
जाड़े की दुपहरी बेला। गाँधी मैदान थाने के पिछवाड़े बगीचे में गेंदे के लाल-लाल फूलों की क्यारियों पर नर्म धूप बिखरी पड़ी थी। थोड़ी दूर पर बहती गंगा नदी की धारा धीमी और लहरें शान्त थी। थानेदार प्रद्युमन ठाकुर आराम कुर्सी पर पैर लंबा फैलाए, अलसाए से लेटे हुए थे। बहुत दिनों बाद आज सुबह से उनके इलाके में किसी बड़ी अपराधिक वारदात की खबर नहीं मिलने से मन और मिजाज को कुछ चैन मिला था। हाजत में बंद एक अमीर तस्कर के द्वारा मंगाए गए पाॅल होटल का लजीज तन्दूर मुर्गा और कश्मीरी पुलाव खा कर थानेदार साहब तृप्त थे। डकार भी इलायची-केशर की सुगंध से भरी आ रही थी। एक तरफ गंगा की लहरों को छू कर उठती कुनकुनी हवा और दूसरी तरफ से सूरज की किरणों का उष्ण स्पर्श, दोनों मिलकर उनके देह, दिल और दिमाग पर तिलस्मी असर डाल रही थीं। मन ही मन गुनगुना रहे थे, ‘‘दिल ढूँढ़ता है..., फिर वही..., फुरकत के रात दिन...’’। वे तंद्रा और निंद्रा के सागर में उब-डूब कर रहे थे ..., कि डकैती की खबर आ गयी। 
थानेदार साहब की डाँट से बचने के लिए, सिपाही ने डकैती की पूरी खबर एक ही सांस में सुना दी और कोने में हाथ बांध खड़ा हो गया था। खबर सुनते ही थानेदार साहब की तंद्रा, निंद्रा, आलस्य, क्रोध ... सभी मनोभाव हवा में उड़ गए। थानेदार साहब सिपाही को भरपूर डांटना चाहते थे, पर मौके की नजाकत देखकर चुप लगा गए।
पिछले एक साल से अपराधियों ने उनके क्षेत्र में कोहराम मचा रखा था। पुलिस की जगजाहिर नाकामी के कारण गले की चेन, सेलफोन और घड़ी आदि छीनने की रपट तो आम जनता लिखवाने ही नहीं आती थी। पर चोरी, डाका, अपहरण एवं हत्या के मामले तो पूरी तरह रफा-दफा नहीं किए जा सकते थे। धीर-गंभीर थानेदार ठाकुर साहब ने दो चार गहरी सांस ली और ड्राइवर एवं आरक्षी टोली को शीघ्र तैयार होने का आदेश देकर गुसल की ओर कदम बढ़ाया। ... पाँच मिनट के अन्दर उनकी बड़ी गश्ती जीप पांच सशस्त्र आरक्षियों के साथ घटनास्थल की दिशा में कूच कर गई।
ड्राइवर ने जीप के उपर लगेे नारंगी फ्लैश लाइट को जला दिया और सायरन बजाते हुए पूरी गति से अन्य वाहनों को ओवरटेक करने का प्रयास शुरू किया। एक ही रास्ते पर पैदल, रिक्शा, ठेला, कार, जीप और स्कूल बसों के चलने से ट्रैफिक की गति ‘चींटी-चाल’ सी हो गई थी। रोड पर डिवाइडर बन जाने से सड़क की दूसरी तरफ से भी गाड़ी दौड़ाना संभव नहीं था। थानेदार साहब हड़बड़ी में बोले जा रहे थे, ‘‘जल्दी चल ऽऽ..., जल्दी चलाव ऽऽ...।’’ ड्राइवर था तो एक्सपर्ट पर दूसरी गाड़ियों के उपर से उछालकर ले जाना तो संभव नहीं था। मात्र दो किलोमीटर की दूरी तय करने में ही उन्हें बीस मिनट लग गए। वहाँ पहुंचने पर घटनास्थल का दृश्य देखकर थानेदार साहब भी हतप्रभ हो गए।
राजधानी के व्यस्ततम महात्मा गाँधी रोड पर स्थित नेशनल बैंक के मुख्य द्वार के सामने सैकड़ो तमाशबीनों की भीड़ एक वृहदाकार वृत बनाए खड़ी थी। द्वार के पास दो घायल संतरी कराह, छटपटा रहे थे; तीसरा गहरी चोट के कारण बेहोश पड़ा था और चैथा बदहवास, कभी एक के पास, कभी दूसरे के पास भाग रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था क्या करें, कैसे अपने घायल साथियों को मौत के मुँह में जाने से बचाए।
घटना स्थल पर एक-दो कैमरामैन पहुंच चुके थे। किसी न्यूज चैनल की ‘डिश एन्टेना’ लगी गाड़ी भी दिख रही थी। वे अपना कैमरा सेट करने में व्यस्त थे। मीडियाकर्मियों को तो अपने काम से काम था, घायलों को बचाने में उनकी कोई रूचि नहीं थी। जितनी बड़ी घटना या दुर्घटना होगी उतना ही बड़ा ‘न्यूज’ बनेगा। और अभी तो उन्हें ‘ब्रेकिंग न्यूज’ के लिए मसाला मिल रहा था।
खैर, थानेदार साहब ने आते ही स्थिति पर नियंत्रण पाने का प्रयास शुरू किया। सबसे पहले एक सिपाही को कहा, ‘‘नीचे गिरे रूपयों की गड्डियों को झोले में बटोर कर ड्राइवर साहब के पास रखो।’’
अन्य दो सिपाहियों को आदेश दिया, ‘‘एक-एक संतरी के साथ रिक्शा में बैठो और पाॅपुलर नर्सिंग होम मे ले जा कर इलाज कराओ। मेरा मोबाइल नंबर तो तुम्हारी डायरी में लिखा है। अगर मैनेजर या डाक्टर ना-नुकुर करें, तो तुरंत मुझसे बात कराना।’’
चैथे सिपाही को आदेश दिया, ‘‘तुम घटना का पूरा ब्यौरा लिखो। ध्यान रखो भीड़ इधर न आ पाए।’’ और तब बेहोश संतरी को एक सिपाही की मदद से गश्ती जीप में पीछे लिटाया।
तब तक दो ट्रैफिक पुलिस भी मोटरसाइकिल से घटना स्थल पर आ चुके थे और भीड़ को सड़क किनारे रखने का प्रयास करने लगे। थानेदार साहब ने एक ट्रैफिक पुलिस को मोटरसाइकिल पर आगे-आगे रास्ते साफ करते हुए बढ़ने को कहा, और पीछे-पीछे गश्ती जीप में बेहोश संतरी और उसके साथी को लेकर मेडिकल काॅलेज अस्पताल की ओर बढ़ निकले।
घटना स्थल पर भीड़ की तादाद सैकड़ों से बढ़कर हजारों तक पहुंच चुकी थी। दिनदहाड़े होती अपराधिक घटनाओं से जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा था। दबी जुबां में हो रहे आलोचना के स्वर बढ़कर, विरोध के नारों की शक्ल में बुलन्द होने लगे ..., ‘‘पुलिस-प्रशासन, हाय-हाय, हाय-हाय’’ ... ‘‘डी.एम., एस.पी. मुर्दाबाद-मुर्दाबाद’’ ... आदि-आदि।
घटना तो एक थी पर थानेदार साहब के सामने काम एवं समस्याएँ अनेक थीं। घायल संतरी का इलाज, घटना स्थल की रपट, अपराधियों की पहचान और खोजबीन, भीड़ पर नियंत्रण और जनता के आक्रोश को शांत करना ...। एक सक्षम योद्धा की भांति थानेदार साहब इन समस्याओं को सुलझाने में लग गये।
यातायात की समस्त बाधाओं के बावजूद घटना स्थल तेजी से पहुंच कर घायलों को हटा लेने का उनका पहला कदम तो सफल हो गया था। केवल एक चैनल का रिपोर्टर तड़पते घायलों की हृदय-विदारक तस्वीर लेने में कामयाब हो पाया था। संचार क्रांति के ये नये उपकरण, एक लचर व्यवस्था की शिकार पुलिस के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो रहे थे। जनता भी पुलिस को इत्तला करने के पहले न्यूज चैनल के सेलफोन पर खबर देने लगी थी। मीडिया की सक्रियता पुलिस के लिए परेशानी का सबब बन रही थी। आज भी कुछ वैसा ही हुआ, जबतक खबर कन्ट्रोल रूम पहुंच कर ‘वायरलेस’ पर रिले होता, टेलीविजन चैनल वाले अपने लाव-लश्कर के साथ घटना स्थल पर पहुंच चुके थे।
थानेदार साहब ने, अस्पताल पहंुचकर अपने संपर्को का इस्तेमाल करते हुए बेहोश संतरी को सीधे आपरेशन थियेटर में भिजवा दिया। छात्र जीवन के दौरान मेडिकल कालेज की कैंटीन में अड्डेबाजी करते रहने से, उस कैंपस में उनका चेहरा जाना पहचाना था। पुलिस केस के सिलसिले में डाक्टरों से उनकी भेंट मुलाकात भी होती रहती थी। आनन-फानन में डाक्टरों ने घायल संतरी की नाक में आॅक्सीजन और नस में दवा देने की नली लगा दी। थानेदार साहब को संतरी की जान बचाने के साथ-साथ अपनी तत्परता और पुलिस की सक्षमता सिद्ध करनी थी।
डाक्टरों को बेहोश संतरी की दिल की धड़कन तो मिल रही थी पर नब्ज बहुत कमजोर थी। वह सांस ठीक से नहीं ले पा रहा था। अपराधियों की एक गोली दाहिनी छाती में घुसकर फेफड़ों को छेद चुकी थी। पेट में लगी दूसरी गोली से खून रिस रहा था। रह-रह कर, वह मछली की तरह छटपटा रहा था।
संतरी के चोटों और ‘उल्टी सांस’ की स्थिति को देखकर डाक्टरों ने उसके बचने की संभावना नगण्य बता दी। फिर भी इलाज जारी रहा। ‘जब तक सांस-तब तक आस।’ मेडिकल कालेज के डाक्टर, इलाज में कोई कमी नहीं रखना चाहते थे, भले ही उन्हें इस प्रयास की निरर्थकता का पूरा आभास था। सभी प्राण रक्षक दवाएँ कोर्टिसोन और कोरामीन दी और सांस की नली में भी पाइप लगा कर आक्सीजन देना शुरू कर दिया। हाथ की नस में ग्लूकोज और ‘डोपामीन’ का घोल चढ़ने लगा। दस-दस मिनट पर ‘पल्स’ और ‘ब्लड प्रेशर’ नापा जाने लगा। आपरेशन की तैयारी शुरू कर दी गयी। जान बचाने के लिए फेफड़ों और पेट, दोनों चोट की शीघ्र मरम्मत जरूरी थी।
थानेदार साहब की गश्ती-जीप के वायरलेस सेट पर कन्ट्रोल रूम और एस.पी. साहब का ‘मैसेज’ बार-बार गूँज रहा था। घटनास्थल के आसपास जनता सड़क पर उतर आयी थी और जनाक्रोश बढ़ रहा था। सरकारी गाड़ी एवं पुलिसवाले अपनी पहचान छुपा कर भाग रहे थे। कौन जाने ..., भीड़ का गुस्सा किस पर उतर जाए। जनता यह मानने के लिए तैयार ही नहीं थी, कि पुलिस बल की संख्या, अस्त्र-शस्त्र एवं प्रशिक्षण इतने बड़े राज्य की कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपर्याप्त थे। राजनीतिज्ञों की दखलअंदाजी के कारण पुलिस का मनोबल भी गिरा हुआ था। बढ़ते अपराध की जिम्मेदारी पूरी तरह पुलिस की अक्षमता पर थोपी जा रही थी।
थोड़ी देर में कुछ न्यूज रिपोर्टर अपने माइक्रोफोन एवं कैमरा के साथ अस्पताल भी पहुंच गए और कभी डाक्टरों से, कभी तीमारदारों और वहाँ खड़े तमाशबीनों से बयान लेने लगे। माहौल बिगड़ने की संभावना दिखने लगी। डकैती की यह वारदात शहर की कानून व्यवस्था को धराशायी करने के लिये पर्याप्त साबित होती दिख रही थी। जनता की सोच में इन वारदातों के लिए पुलिस ही असली गुनहगार थी, न कि अपराधी। पुलिस के वरीय अफसर, ‘आई.जी’., ‘एस.एस.पी.’ आदि थानेदार साहब से संपर्क बनाए हुए स्थिति पर पैनी निगाह रखे हुए थे।
आपातकालीन कक्ष में तैनात डाक्टरों ने थानेदार साहब को संतरी की मरणासन्न अवस्था की वास्तविकता से अवगत करा दिया तथा सीनियर सर्जन डा. जे. के. सिंह को बुलाने के लिए ‘काॅल’ रजिस्टर पर घायल रोगी का बिस्तृत ब्यौरा लिख कर दिया। माना जाता था कि प्रख्यात सर्जन सिंह के हाथों में मरते रोगियों को बचा लेने की ताकत थी। डा. सिंह अपने समकक्ष डाक्टरों से कुछ ज्यादा ही स्वाभिमानी या अभिमानी थे। बिना सही प्रक्रिया के अस्पताल बुलाया जाना अपनी तौहीन समझते थे। रजिस्टर में लिखे ‘काॅल’ के साथ जब अस्पताल की गाड़ी उन्हें आवास से लाने जाती थी, तब ही वे अस्पताल आते थे-यह बात सर्वविदित थी। नेता, पुलिस और मरीजों के परिजनों की गाड़ी से वे परहेज करते थे।
थानेदार साहब ने शल्य कक्ष में जा कर बेहोश संतरी को देखा। संतरी की खुली पलकों से झांकती बड़ी-बड़ी आंखें छत के किसी बिन्दु पर स्थिर थी। दर्जनों दुर्घटनाओं, वारदातों और ‘एन्काउंटर’ की चश्मदीद गवाह, उनकी आँखें समझ गई कि आपरेशन टेबुल पर लेटे बेहोश संतरी को यमराज के चंगुल से कोई नहीं बचा सकता, चाहे डा. सिंह आएं या डा. प्रसाद, डा. मिश्रा या डा. धर्मराज।
जब तक अस्पताल का अर्दली ‘काॅल’ रजिस्टर ले कर अस्पताल की गाड़ी पर सवार होता, थानेदार साहब की गश्ती जीप डा. जे. के. सिंह के आवास की तरफ तेजी से रवाना हो गई। थानेदार साहब ने खुद डा. साहब के घर की ‘काॅलबेल’ दबायी, प्रणाम-पाती कर संक्षेप में घटना और बेहोश संतरी के बारे में बताया। उन्होंने डा. सिंह से हाथ जोड़कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, आप मेरे साथ तुरंत अस्पताल चलिए। आप के हाथ में जस है ..., जादू है। आप चलेंगे तो संतरी की जान जरूर बच जाएगी।’’
पर डाक्टर साहब तो थे, ‘नियम के पक्के’। उन्होंने थानेदार साहब की उम्मीद के मुताबिक, पुलिस जीप में जाने के अनुरोध को डाक्टर सिंह ने ठुकरा दिया। थानेदार साहब ने फिर कुछ देर विनती की, हाथ जोड़े, झुके, गिड़गिड़ाए और अंत में हार मानकर अस्पताल लौट गए।
अस्पताल वापस आकर थानेदार साहब ने जनता, उपस्थित अन्य डाक्टरों और मीडिया के सामने बयान दे दिया, ‘‘मैं खुद डाक्टर जे. के. सिंह को बुलाने उनके घर गया था, पर उन्होंनेे मेरी विनती ठुकरा दी..., पुलिस तो तत्परता से काम कर रही है, पर समाज का सहयोग नही मिल रहा है..., अपराध एवं उससे होने वाले नुकसान को कम करने में समाज की सहभागिता आवश्यक है...’’
जनता के मन में थानेदार साहब के प्रति सहानुभूति जग गई। लोग डाक्टर के अक्खड़पन की आलोचना करने लगे। मीडिया सारे घटनाक्रम का ‘आँखों-देखा-हाल’ प्रसारित कर राज्य और राष्ट्र को रूबरू करा रहा था। लोग-बाग पुलिस की लचरपन की कम और डाक्टरों की मनमानी की आलोचना ज्यादा करने लगे।
थोड़ी देर में अस्पताल की गाड़ी ‘काॅल रजिस्टर’ के साथ डा. जे. के. सिंह के निवास पर पहुंची। डा. सिंह तत्काल तैयार हो कर अस्पताल की ओर बढ़े...। इधर डा. सिंह की गाड़ी अस्पताल के द्वार पर आई, उधर बेहोश संतरी के प्राण-पखेरू उड़ गए। डा. जे. के. सिंह को अपनी काबिलियत दिखाने का मौका दिए बिना, संतरी सबको अलविदा कह कर वह दूसरी दुनिया को कूच कर गया।
डा. जे. के. सिंह को सामने देख, गुस्साई भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उन्हें डाँटने फटकारने लगी। कुछ धक्का-धुक्की और हाथापाई भी हुई। उनके विरूद्ध नारेबाजी और गाली-गलौज शुरू कर दी गई। आक्रोशित जनता के एक समूह ने उनके आवास के सामने जाकर नारेबाजी और पत्थरबाजी शुरू कर दी।
डा. जे. के. सिंह की सारी कानूनबाजी और अक्खड़पन गुम हो चुकी थी। अब वे ही थानेदार साहब के सामने करबद्ध खड़े, अपनी और परिवार की सुरक्षा की गुहार कर रहे थे। पासा पलट गया था। करबद्ध विनती की गुहार ठुकराने वाला स्वयं करबद्ध विनती करने को मजबूर था। शाम के धुधंलके में भी थानेदार साहब के होठों पर मंद-मंद मुस्कान तैर रही थी। उन्होंने डा. जे. के. सिंह को अपनी गश्ती जीप में दो सिपाहियों के बीच सुरक्षित बिठा दिया। चार बंदूकधारी आरक्षियों को उनके निवास की सुरक्षा के लिए रवाना किया।
शहर के विभिन्न थानों के दारोगा और सिपाही अपने-अपने इलाके में गश्त लगाने लगे। रात होते-होते पूरे शहर में शांति व्यवस्था कायम हो गई।
देर रात आई. जी. और सीनियर एस.पी. दोनों ने थानेदार साहब को फोन किया। उन्हें मामले को कुशलतापूर्वक निपटाने के लिए शाबासी दी, ‘‘वेरी टैक्टफुल हैंडलिंग’’, बताया राज्य के गृहमंत्री तुम्हारे मीडिया में दिए गए बयान की चर्चा कर रहे थे। और शीघ्र प्रमोशन का आश्वासन दिया।
और अगली सुबह अखबार के मुखपृष्ठ पर दो खबरें प्रमुखता से छपी थी ...
‘‘डाक्टरों की लापरवाही से बैंक-डकैती में घायल संतरी की मौत’’
‘‘बैंक-डकैती में तत्पर कार्रवाई के लिए थानेदार प्रद्युमन ठाकुर को राष्ट्रपति पदक देने की जनता द्वारा मांग।’’

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