नमाज़े ज़नाज़ा
सुबह दस बजे का समय। मुर्गे बांग दे कर शांत हो गये थे। सूरज की उष्मा घास-पत्तों की नोकों पर टिकी ओस सुखा चुकी थी। बच्चे स्कूल एवं लोग बाग काम पर जा चुके थे। पूरी गली में सन्नाटा छाया हुआ था। सन्नाटे को तोड़ती हुई दरवाजे पर सांकल की ठन-ठन की आवाज सुन बुजुर्ग धोबी आज़िम खां कुनमुनाए। दुबारा सांकल बजने पर उन्होंनेे धीरे-धीरे आंखें खोली। करवट बदलने की कोशिश की।
चार दिनों से बुखार की तपन एवं शरीर की पीड़ा से उबर कर इस रात ही थोड़ी नींद आई थी और वे देर सुबह तक सोते रह गये थे। चारों तरफ नजर दौड़ाई ..., घर खाली पड़ा था ... शायद बेटा-पतोहू कपड़े धोने गए हों। तिबारा ठन-ठन की आवाज आने पर किसी तरह कराहते हुए उठकर दरवाजा खोला। देखा, सामने सेठ रामनारायण का नौकर नन्दू हाथ में सफेद कपड़े का एक ढेर लिए हुए खड़ा था।
आज़िम खां को देखते ही नन्दू का चेहरा पीला पड़ गया, जैसे उसने कोई भूत देख लिया हो। कपड़े का ढेर उसके हाथ से गिर गया ..., लगा वह गश खाकर गिर पड़ेगा। कुछ पल दोनों एक दूसरे को एकटक देखते रहे। एक दूसरे की आंखों के भाव पढ़ने की कोशिश करते रहे। तब तक आज़िम का बेटा असगर पिछवाड़े से हाथ पोंछते आया ...
‘‘का बात है नन्दू ..., काहे के लिए आया है ..., ई कपड़ा कइसा है ... ?’’
नन्दू के हाथों में सफेद मलमल का ढेर देख असगर अचम्भित हो गया। धोबी के पास तो लोग धुलवाने के लिए गन्दे कपड़े लेकर आते हैं, नन्दू नया सफेद मलमल क्यों लाया ?
दरवाजे के इर्द-गिर्द खड़े तीनों शख्स एक दूसरे को चुपचाप सवालिया निगाहों से घूर रहे थे... और जानने की कोशिश कर रहे थे, आखिर बात क्या है ?
कुछ देर में नन्दू खुद को संभालते हुए असगर को थोड़ा अलग ले गया और फुसफुसाहट में बताया ...
‘‘शहर में खबर फैली है कि आज़िम अल्लाह को प्यारे हो गए। सेठ जी ने कफन का कपड़ा भेजा है ... आप तो जानते ही हैं, सेठ जी अपनों का कितना ख्याल रखते हैं ... सुबह-सुबह छोटे भाई से दुकान खुलवा कर मलमल का थान भिजवाया है।’’
बात तो फुसफुसाहट में हो रही थी, पर बोलने के लहजे से और पैरों के पास पड़े मलमल के ढेर को देखकर आज़िम खां सारा माज़रा समझ गए।
असगर ने अपनी खीज दबाते हुए नन्दू को मलमल लेकर, लौट जाने का इशारा किया।
आज़िम तो कुछ देर तक सन्न रह गए। फिर संभल कर कहा ...
‘‘अल्लाह के नाम से, जो बहुत रहीम और करीम है ..., हम बहुत खुशकिस्मत हैं ..., हमें जिन्दगी में ही पता लग गया, मेरी मौत के बाद मुझे कफन के कपड़े और एक पाक़ क़ब्र जरूर नसीब होगी। खुदा की रहमत मुझ पर जरूर बरसेगी। हे अल्लाह! मेरी कब्र की घबराहट को लगाव में बदल दे।’’
‘‘नन्दू, रामनारायण बाबू को मेरा शुक्रिया बोल देना, हे अल्लाह! दुनिया के पालनकत्र्ता मालिक उन्हें बरक्कत दे, जिन्दगी की हर खुशी उनके खानदान को मिले ... हमेे अपना समझा, तभी तो मेरी मौत की फ़कत अफवाह पर, कफन का कपड़ा और मय्यत के लिए रूपये भिजवाए।’’
यह वाकया हिन्दुस्तान के छोटे से कस्बे में हुआ, जो झारखंड की सीमा पर दो बरसाती नदियों के संगम पर स्थित था। भारत के हर गांव-कस्बे की भांति यहां भी कुछ पैसे वाले, कुछ कम पैसे वाले और कुछ निहायत गरीब रहते थे। पैसे वालों का पैसा भी उनकी व्यवसाय करने की पूंजी थी, न कि ऐश करने की राह। कस्बे में बसने वाले विभिन्न जातियों के हिन्दुओं और सुन्नी मुसलमानों के बीच एक अनूठा सामंजस्य बना हुआ था। कस्बे की मुख्य भूमि पर खेतों के मालिक, गौशाला के स्वामी, हिन्दु व्यवसायी और सिलाई कढ़ाई का थोक काम कराने वाले अमीर मुसलमान रहते थे। नदी किनारे हलवाई, किराने वाले और छोटे व्यवसायियों की घर-दुकनियाँ थी। नदी पार दूसरे तट पर कोईरी, चमार, धोबी आदि व्यवसाय वालों के झोपड़ों के अलग-अलग झुंड थे। सारी आबादी एक दूसरे पर किसी न किसी रूप में आश्रित थी और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का माहौल था। पर्यावरण की परिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम), जहां अस्तित्व के लिए बड़ा जानवर छोटे जानवर को अपना आहार बनाता है, उसका ठीक उल्टा परिवेश इस गंाव का था। यहां हर व्यक्ति एक दूसरे के अस्तित्व के लिए एक सहारा था, न कि उसका भक्षक। होली, दीवाली, दशहरा, मुहर्रम, ईद, बकरीद आदि त्योहारों पर गांव प्रेम एवं भाईचारे की तस्वीर बन जाता था, जो प्रायः गांव के नवोदित टूटपूंजिए नेताओं के आंख की किरकिरी बन जाता था।
सेठ रामनारायण इस गांव केे कपड़े के एक इज्जतदार व्यापारी थे। अभी उनकी उम्र साठ साल के आसपास है। चालीस साल पहले माँ की दी गई मात्र एक सौ रूपये की पूंजी से धोती-गमछा का गट्ठर माथे पर ढोकर, फेरीवाले के रूप में उन्होंने काम शुरू किया था। अपनी मेहनत, ईमानदारी और कम मुनाफा लेने की नीति से उनका धंधा बढ़ता गया और फेरी से गुमटी, फिर दूकान और अब आढ़त के मालिक हो गए। विवाह के बाद बच्चे-बच्चियां हुए, अब भरा पूरा परिवार हो गया। समाज में लोग बाग उनकी बातों-विचारों की कद्र करते थे। जिस शख्स की लगभग आधी उम्र गरीबी में गुजर जाए, कुछ धन धान्य होने के बाद भी उसे अपनी सुख-सुविधा और विलासिता की चाहत नही रहती।
आज़िम खां ने रामनारायण बाबू की किस्मत को अपनी आँखों के सामने पलटते देखा था, और उनकी मेहनत, ईमानदारी से बढ़ते हर कदम का चश्मदीद गवाह था। आज़िम सबसे कहते थे, ‘‘सेठ जी तो बिना फल की फिकर किए, सच्चा कर्म करते हैं। उनके लिए ईमान और परोपकार ही धन है। पिछले साल रोजगार में उन्हें थोड़ा बेहतर मुनाफा हुआ तो उन्होंने घोड़ा-गाड़ी नही खरीदी, बच्चों का स्कूल बनवा दिया। अल्लाह का करम उनपर सोने की बारिश करेगा ...।’’
देश, समाज, विचारधाराओं, जीवन सब में हो रहे बदलाव के साथ उस शांत गांव में भी नई-नई बातें होने लगी। दो नई बिरादरी-नेताओं की और अपराधियों की - पनपने लगी। नेताओं का मूल मंत्र, ‘‘बिल्लियों के झगड़ों में बन्दर को फायदा’’ कहानी की तरह था। जनता को आपस में लड़ाओ और फिर बीच-बचाव सुलह-सफाई कराते हुए राज करो। अपराधी सीधे-सादे मेहनतकश लोगों को डरा धमकाकर पैसे ऐंठने में लगे रहते थे और मौका मिलने पर लूट खसोट करना उनका धंधा था। दोनों के बीच अंदरूनी तालमेल और सांठगांठ भी थी।
सेठ रामनारायण जी के पास मेहनत और ईमानदारी की थाती थी, इसलिए वे न तो नेताओं से दबते थे, न ही अपराधियों से खौफ खाते थे। एक दो बार अपराधियों ने रंगदारी की मांग की भी, पर वे टाल गए थे, फिर भी अपराधियों के निशाने पर तो थे ही।
वह शाम होलिका दहन की पूर्व संध्या थी। शाम पांच बजे के आसपास, गोधूलि के समय। दिन में अच्छी बिक्री हुई थी पर शाम होते-होते बाजार में सन्नाटा छा गया था। सभी दुकानदार दुकान समेटने में लगे थे। कुछ देर पहले कुख्यात लंगड़ा महमूद दो-तीन गुर्गों के साथ नदी किनारे देखा गया था। एक दुमंजिले घर में डकैती के बाद छत से कूदने के कारण उसके पैर की हड्डी टूट गई थी। हड्डी तो जुट गई, पर पैर टेढ़ा हो गया और महमूद लंगड़ा कर चलता था। पुलिस दो-तीन साल से उसे पकड़ने की कोशिशें कर रही थी, पर ऐन मौके वह पुलिस को चकमा दे जाता था। आज उसका निशाना कौन होगा ?
कुछ देर में सेठ रामनारायण की दूकान पर चार अपराधी तमंचा ताने खड़े थे-
‘‘सेठ जी, रूपया-पईसा झोला में रख दीजिए’’
‘‘महमूद, गलत काम मत कर ..., जाओ यहां से ...’’
‘‘सेठ जी, पैसा देते हैं कि नहीं’’ ... कहते हुए महमूद ने देशी कट्टे से सेठ जी के पैरों पर गोली दाग दी थी। गोली जांघ में लगी थी। भगदड़ मच गई थी। सेठ जी की चीख और शोर-हंगामे के बीच महमूद के गुर्गो ने रूपयों को पास पड़े कपड़े में समेटा और भागने लगे थे।
अपराधी पैदल ही नदी की तरफ भाग रहे थे-शोरगुल सुनकर सामने बीसियों तमाशबीन जुट गए थे जिससे सामने का रास्ता लगभग बंद हो गया था। अपराधी उल्टी दिशा में दौड़े पर उधर और ज्यादा भीड़ जमा हो गयी थी। चारो अपराधी रूपयों का गट्ठर फेंक, तितर-बितर हो गए एवं अलग-अलग दिशा में भागने लगे थे। मजबूत पैर वाले तीन किशोर अपराधी तो किसी तरह भाग गए, पर घिर गया था लंगड़ा महमूद। लोगों ने महमूद पर ढेले-पत्थर फेंकना शुरू कर दिया था। किसी तरह भागते हुए वह कपड़ा-पट्टी से निकल लोहा-पट्टी की तरफ बढ़ गया था, पर वहां तो लोहे के कुदाल, बेलचा उसकी खातिरदारी में खड़े थे। महमूद ने कमर से तमंचा निकाला था और हवा में लहराते हुए भीड़ को ललकारा था,
‘‘खबरदार ..., दूर हट जाओ ..., नहीं तो, एक-एक को भून दूंगा ...।’’
धमकी सुनते ही भीड़ के बीच एक दरार बनने लगी थी, लगा महमूद आज भी बच निकलेगा। महमूद आगे बढ़ा था। अचानक दूर से किसी ने एक पत्थर फेंका था जो ठीक महमूद के तमंचे पर जा लगा था। पत्थर से टकराकर तमंचा दूर फेंका गया था। महमूद का दिमाग सुन्न हो गया था। जान बचाने के लिए वह धीरे-धीरे उल्टे कदम पीछे लौटने लगा था। लोगों का हुजूम उसे चारो तरफ से घेरने लगा था। मौत बांटने वाला आज स्वयं मौत के घेरे में फंस चुका था। दस पंद्रह मिनट में ही जनता के त्वरित न्याय ने लंगड़ा महमूद का काम तमाम कर दिया था। मार इतनी पड़ी थी, कि उसकी शक्ल-सूरत भी पहचान के काबिल नही रही थी।
उधर लोगों की भीड़ ने जहां तक संभव हो सका सेठ जी के छितराए रूपये जमा कर, नौकरों के भरोसे पड़ी दुकान पर पहुंचा दिया था। सेठ जी को उनके कुटुम्ब रिक्शे पर लाद कर पहले ही सरकारी अस्पताल ले जा चुके थे। उनके जख्म से बहुत ज्यादा खून रिस चुका था। नाड़ी धीमी पड़ती जा रही थी। डाक्टरों ने सूई दवाईयां दे दी थी। खून देने का इंतजाम उस छोटी सी डिस्पेन्सरी में नहीं था, अतः उपस्थित डाक्टर ने सेठ जी को शीघ्रातिशीघ्र जिला अस्पताल ले जाने का मशविरा दिया था।
सेठ जी के रिश्तेदार आनन-फानन गाड़ी की व्यवस्था कर जिला अस्पताल के लिए रवाना हो गए थे।
उस छोटे शहर के लिए बीते दिन की वारदात एक बहुत बड़ी घटना थी। मानों एक शांत स्थिर तालाब में किसी ने बड़ा पत्थर फेंक दिया हो और उफनती लहरें, मछलियों, जीव-जंतुओं, कमल पत्तों, घास-पतवार एवं घाट सभी को झकझोर रही हों। आज़िम खां भी खबर सुनकर सन्न रह गए थे। सेठ जी को देखने, उनसे मिलने, हालचाल पूछने के लिए आज़िम बेताब होने लगेे थे। सेठ जी की पूरी जिन्दगी उनकी आंखों के सामने चलचित्र की भांति दिखने लगी थी। आज़िम खां को याद आए थे वे दिन जब उनकी बीबी सख्त बीमार थी, तब सेठ जी ने बिना कोई चीज गिरवी रखे और बिना ब्याज के उन्हें रूपये उधार दिए थे। एक जरूरतमंद को मदद करने की भावना के साथ-साथ सेठ जी यह भी जानते थे कि इस्लाम में ब्याज लेना कुफ्र माना जाता है।
होलिका दहन की शाम। जिला अस्पताल के मुर्दाघर के पास सफेद कपड़ों में लिपटी दोे लाशें पोस्टमार्टम के इन्तजार में पड़ी थी। एक कुख्यात अपराधी की और एक उसके अपराध के शिकार, एक हीरा समान व्यक्ति-दोनों की मृत काया-एक ही धरातल पर पड़ी थी। होलिका की शाम, नरसिंहावतार ने एक दुष्टा का वध किया था, पर बीते दिन के अपराधिक कांड में पापी एवं पुण्यात्मा दोनों सिधार गए थे। मौत ने दोनों इंसानों को एक-समान धरातल पर ला दिया।
अगला दिन, होली का दिन, रंगों का त्योहार पूरे कस्बे के लिए बदरंग हो चुका था। छोटे-छोटे बच्चे भी, समझ नहीं पा रहे थे, ‘आखिर क्या हुआ ?’। बड़ों में हर्ष-उल्लास की कमी छोटों पर भी मनहूसियत की काली छाया डाल रही थी। आसमान में छायी बदली और उदासी बढ़ा रही थी। दूसरी तरफ शहर में उन्माद फैलाने वालों की कमी नहीं थी। छुटभैया नेतागण इसे हिन्दु-मुसलमान का काला रंग देने में जुट गए थे। लोग बाग रंग-अबीर-गुलाल लगाने, एक-दूसरे को होली की मुबारक देने की बजाय, छोटे-छोटे झुंडों में खड़े हो खुसर-पुसर कर रहे थे।
सेठ रामनारायण के घर के बरामदे में सेठजी का शव अर्थी पर रख कर फूलों से सजाया जा चुका था। सगे-संबंधी, मित्र, पड़ोसी श्मशान घाट की ओर प्रस्थान करने की तैयारी में थे। घाट पर लकड़ी की व्यवस्था हो चुकने की खबर मिलते ही ‘‘राम नाम सत्य है’’ की बोली के साथ अर्थी अन्तिम यात्रा के लिए रवाना हो गई।
दूसरी तरफ महमूद की लाश ताबूत में बंद की जा चुकी थी। कब्र खोदे जाने की खबर मिलते ही, ज़नाज़ा कब्रिस्तान की ओर बढ़ने लगा।
कस्बे के दक्षिणी छोर पर पूरब में नदी किनारे श्मशान घाट था और पश्चिम में मस्जिद के बगल में कब्रिस्तान। दोनों जगह जाने के रास्ते आजिम धोबी के घर के पास के तिराहे से अलग होते हैं। आज बूढ़े आजिम इसी दोराहे पर खड़े थे। सेठ जी की अर्थी कुछ देर के लिए आजिम खां के दरवाजे के सामने रखी गयी। सभी जानते थे, सेठ जी आजिम को अपना धोबी नही, अपना हितैषी मानते थे।
मरहूम महमूद का ज़नाजा भी कुछ देर आज़िम के दरवाजे के सामने रखा गया और नमाज़े ज़नाज़ा पढ़ा गया। उसके बाद आज़िम का बेटा ज़नाज़े के साथ बढ़ गया। आज़िम ने श्मशान और कब्रिस्तान जाने वाली दोनों लाशों को दुआएं दी, पर उनके कदम किस तरफ बढ़ेंगे ...? उहापोह में डूब गए बुजुर्ग आज़िम खां !
आज़िम खां ने जिन्दगी भर अल्लाह की बन्दगी की थी। अपनी औकात के हिसाब से ज़कात दी थी और नमाज़ की पाबन्दी की थी। पैसे न जुटा पाने के कारण हज़ नही जा सके थे, पर दिल से सच्चे मुसलमान थे। वे मानते थे कि हर शख्स, जो ईमान धर्म का पालन करे, अच्छे कर्म करे और इन्सान की मदद करे, वह इस्लाम का बंदा है। जो सच्चाई के साथ खड़ा हो, इन्सानों का मददगार हो और अल्लाह की इबादत करे उसका ठिकाना ज़न्नत होगा। जो लोग ईमान वाले इंसानों को तकलीफ पहुंचाते हैं, सताते हैं, उन्हें अल्लाह की लानत लगेगी। झूठ बोलने वाले और गलत काम करने वाले जहन्नुम की आग में झोंके जाऐंगे। उनके विचार से कोई अपराधी, आततायी और आतंकवादी सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता।
उस दिन आजिम खां दर्जनों मुस्लिम अनुयायियों को एक गुनहगार के जनाजे में शामिल होते देख रहे थे, इसलिए कि वह अपराधी एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ था। पर आजिम खां के जेहन में सवाल उठ रहा था, कौन था वास्तव में इस्लाम धर्म का सही बंदा ...? इस्लाम की कसौटी पर कौन खड़ा उतरेगा ...? एक गुनाहगार या एक सच्चा इंसान...? किधर जाए वो ..?
आज़िम के कदम श्मशान घाट की तरफ बढ़ गये ...।
प्रदीप कुमार अग्रवाल
सुबह दस बजे का समय। मुर्गे बांग दे कर शांत हो गये थे। सूरज की उष्मा घास-पत्तों की नोकों पर टिकी ओस सुखा चुकी थी। बच्चे स्कूल एवं लोग बाग काम पर जा चुके थे। पूरी गली में सन्नाटा छाया हुआ था। सन्नाटे को तोड़ती हुई दरवाजे पर सांकल की ठन-ठन की आवाज सुन बुजुर्ग धोबी आज़िम खां कुनमुनाए। दुबारा सांकल बजने पर उन्होंनेे धीरे-धीरे आंखें खोली। करवट बदलने की कोशिश की।
चार दिनों से बुखार की तपन एवं शरीर की पीड़ा से उबर कर इस रात ही थोड़ी नींद आई थी और वे देर सुबह तक सोते रह गये थे। चारों तरफ नजर दौड़ाई ..., घर खाली पड़ा था ... शायद बेटा-पतोहू कपड़े धोने गए हों। तिबारा ठन-ठन की आवाज आने पर किसी तरह कराहते हुए उठकर दरवाजा खोला। देखा, सामने सेठ रामनारायण का नौकर नन्दू हाथ में सफेद कपड़े का एक ढेर लिए हुए खड़ा था।
आज़िम खां को देखते ही नन्दू का चेहरा पीला पड़ गया, जैसे उसने कोई भूत देख लिया हो। कपड़े का ढेर उसके हाथ से गिर गया ..., लगा वह गश खाकर गिर पड़ेगा। कुछ पल दोनों एक दूसरे को एकटक देखते रहे। एक दूसरे की आंखों के भाव पढ़ने की कोशिश करते रहे। तब तक आज़िम का बेटा असगर पिछवाड़े से हाथ पोंछते आया ...
‘‘का बात है नन्दू ..., काहे के लिए आया है ..., ई कपड़ा कइसा है ... ?’’
नन्दू के हाथों में सफेद मलमल का ढेर देख असगर अचम्भित हो गया। धोबी के पास तो लोग धुलवाने के लिए गन्दे कपड़े लेकर आते हैं, नन्दू नया सफेद मलमल क्यों लाया ?
दरवाजे के इर्द-गिर्द खड़े तीनों शख्स एक दूसरे को चुपचाप सवालिया निगाहों से घूर रहे थे... और जानने की कोशिश कर रहे थे, आखिर बात क्या है ?
कुछ देर में नन्दू खुद को संभालते हुए असगर को थोड़ा अलग ले गया और फुसफुसाहट में बताया ...
‘‘शहर में खबर फैली है कि आज़िम अल्लाह को प्यारे हो गए। सेठ जी ने कफन का कपड़ा भेजा है ... आप तो जानते ही हैं, सेठ जी अपनों का कितना ख्याल रखते हैं ... सुबह-सुबह छोटे भाई से दुकान खुलवा कर मलमल का थान भिजवाया है।’’
बात तो फुसफुसाहट में हो रही थी, पर बोलने के लहजे से और पैरों के पास पड़े मलमल के ढेर को देखकर आज़िम खां सारा माज़रा समझ गए।
असगर ने अपनी खीज दबाते हुए नन्दू को मलमल लेकर, लौट जाने का इशारा किया।
आज़िम तो कुछ देर तक सन्न रह गए। फिर संभल कर कहा ...
‘‘अल्लाह के नाम से, जो बहुत रहीम और करीम है ..., हम बहुत खुशकिस्मत हैं ..., हमें जिन्दगी में ही पता लग गया, मेरी मौत के बाद मुझे कफन के कपड़े और एक पाक़ क़ब्र जरूर नसीब होगी। खुदा की रहमत मुझ पर जरूर बरसेगी। हे अल्लाह! मेरी कब्र की घबराहट को लगाव में बदल दे।’’
‘‘नन्दू, रामनारायण बाबू को मेरा शुक्रिया बोल देना, हे अल्लाह! दुनिया के पालनकत्र्ता मालिक उन्हें बरक्कत दे, जिन्दगी की हर खुशी उनके खानदान को मिले ... हमेे अपना समझा, तभी तो मेरी मौत की फ़कत अफवाह पर, कफन का कपड़ा और मय्यत के लिए रूपये भिजवाए।’’
यह वाकया हिन्दुस्तान के छोटे से कस्बे में हुआ, जो झारखंड की सीमा पर दो बरसाती नदियों के संगम पर स्थित था। भारत के हर गांव-कस्बे की भांति यहां भी कुछ पैसे वाले, कुछ कम पैसे वाले और कुछ निहायत गरीब रहते थे। पैसे वालों का पैसा भी उनकी व्यवसाय करने की पूंजी थी, न कि ऐश करने की राह। कस्बे में बसने वाले विभिन्न जातियों के हिन्दुओं और सुन्नी मुसलमानों के बीच एक अनूठा सामंजस्य बना हुआ था। कस्बे की मुख्य भूमि पर खेतों के मालिक, गौशाला के स्वामी, हिन्दु व्यवसायी और सिलाई कढ़ाई का थोक काम कराने वाले अमीर मुसलमान रहते थे। नदी किनारे हलवाई, किराने वाले और छोटे व्यवसायियों की घर-दुकनियाँ थी। नदी पार दूसरे तट पर कोईरी, चमार, धोबी आदि व्यवसाय वालों के झोपड़ों के अलग-अलग झुंड थे। सारी आबादी एक दूसरे पर किसी न किसी रूप में आश्रित थी और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का माहौल था। पर्यावरण की परिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम), जहां अस्तित्व के लिए बड़ा जानवर छोटे जानवर को अपना आहार बनाता है, उसका ठीक उल्टा परिवेश इस गंाव का था। यहां हर व्यक्ति एक दूसरे के अस्तित्व के लिए एक सहारा था, न कि उसका भक्षक। होली, दीवाली, दशहरा, मुहर्रम, ईद, बकरीद आदि त्योहारों पर गांव प्रेम एवं भाईचारे की तस्वीर बन जाता था, जो प्रायः गांव के नवोदित टूटपूंजिए नेताओं के आंख की किरकिरी बन जाता था।
सेठ रामनारायण इस गांव केे कपड़े के एक इज्जतदार व्यापारी थे। अभी उनकी उम्र साठ साल के आसपास है। चालीस साल पहले माँ की दी गई मात्र एक सौ रूपये की पूंजी से धोती-गमछा का गट्ठर माथे पर ढोकर, फेरीवाले के रूप में उन्होंने काम शुरू किया था। अपनी मेहनत, ईमानदारी और कम मुनाफा लेने की नीति से उनका धंधा बढ़ता गया और फेरी से गुमटी, फिर दूकान और अब आढ़त के मालिक हो गए। विवाह के बाद बच्चे-बच्चियां हुए, अब भरा पूरा परिवार हो गया। समाज में लोग बाग उनकी बातों-विचारों की कद्र करते थे। जिस शख्स की लगभग आधी उम्र गरीबी में गुजर जाए, कुछ धन धान्य होने के बाद भी उसे अपनी सुख-सुविधा और विलासिता की चाहत नही रहती।
आज़िम खां ने रामनारायण बाबू की किस्मत को अपनी आँखों के सामने पलटते देखा था, और उनकी मेहनत, ईमानदारी से बढ़ते हर कदम का चश्मदीद गवाह था। आज़िम सबसे कहते थे, ‘‘सेठ जी तो बिना फल की फिकर किए, सच्चा कर्म करते हैं। उनके लिए ईमान और परोपकार ही धन है। पिछले साल रोजगार में उन्हें थोड़ा बेहतर मुनाफा हुआ तो उन्होंने घोड़ा-गाड़ी नही खरीदी, बच्चों का स्कूल बनवा दिया। अल्लाह का करम उनपर सोने की बारिश करेगा ...।’’
देश, समाज, विचारधाराओं, जीवन सब में हो रहे बदलाव के साथ उस शांत गांव में भी नई-नई बातें होने लगी। दो नई बिरादरी-नेताओं की और अपराधियों की - पनपने लगी। नेताओं का मूल मंत्र, ‘‘बिल्लियों के झगड़ों में बन्दर को फायदा’’ कहानी की तरह था। जनता को आपस में लड़ाओ और फिर बीच-बचाव सुलह-सफाई कराते हुए राज करो। अपराधी सीधे-सादे मेहनतकश लोगों को डरा धमकाकर पैसे ऐंठने में लगे रहते थे और मौका मिलने पर लूट खसोट करना उनका धंधा था। दोनों के बीच अंदरूनी तालमेल और सांठगांठ भी थी।
सेठ रामनारायण जी के पास मेहनत और ईमानदारी की थाती थी, इसलिए वे न तो नेताओं से दबते थे, न ही अपराधियों से खौफ खाते थे। एक दो बार अपराधियों ने रंगदारी की मांग की भी, पर वे टाल गए थे, फिर भी अपराधियों के निशाने पर तो थे ही।
वह शाम होलिका दहन की पूर्व संध्या थी। शाम पांच बजे के आसपास, गोधूलि के समय। दिन में अच्छी बिक्री हुई थी पर शाम होते-होते बाजार में सन्नाटा छा गया था। सभी दुकानदार दुकान समेटने में लगे थे। कुछ देर पहले कुख्यात लंगड़ा महमूद दो-तीन गुर्गों के साथ नदी किनारे देखा गया था। एक दुमंजिले घर में डकैती के बाद छत से कूदने के कारण उसके पैर की हड्डी टूट गई थी। हड्डी तो जुट गई, पर पैर टेढ़ा हो गया और महमूद लंगड़ा कर चलता था। पुलिस दो-तीन साल से उसे पकड़ने की कोशिशें कर रही थी, पर ऐन मौके वह पुलिस को चकमा दे जाता था। आज उसका निशाना कौन होगा ?
कुछ देर में सेठ रामनारायण की दूकान पर चार अपराधी तमंचा ताने खड़े थे-
‘‘सेठ जी, रूपया-पईसा झोला में रख दीजिए’’
‘‘महमूद, गलत काम मत कर ..., जाओ यहां से ...’’
‘‘सेठ जी, पैसा देते हैं कि नहीं’’ ... कहते हुए महमूद ने देशी कट्टे से सेठ जी के पैरों पर गोली दाग दी थी। गोली जांघ में लगी थी। भगदड़ मच गई थी। सेठ जी की चीख और शोर-हंगामे के बीच महमूद के गुर्गो ने रूपयों को पास पड़े कपड़े में समेटा और भागने लगे थे।
अपराधी पैदल ही नदी की तरफ भाग रहे थे-शोरगुल सुनकर सामने बीसियों तमाशबीन जुट गए थे जिससे सामने का रास्ता लगभग बंद हो गया था। अपराधी उल्टी दिशा में दौड़े पर उधर और ज्यादा भीड़ जमा हो गयी थी। चारो अपराधी रूपयों का गट्ठर फेंक, तितर-बितर हो गए एवं अलग-अलग दिशा में भागने लगे थे। मजबूत पैर वाले तीन किशोर अपराधी तो किसी तरह भाग गए, पर घिर गया था लंगड़ा महमूद। लोगों ने महमूद पर ढेले-पत्थर फेंकना शुरू कर दिया था। किसी तरह भागते हुए वह कपड़ा-पट्टी से निकल लोहा-पट्टी की तरफ बढ़ गया था, पर वहां तो लोहे के कुदाल, बेलचा उसकी खातिरदारी में खड़े थे। महमूद ने कमर से तमंचा निकाला था और हवा में लहराते हुए भीड़ को ललकारा था,
‘‘खबरदार ..., दूर हट जाओ ..., नहीं तो, एक-एक को भून दूंगा ...।’’
धमकी सुनते ही भीड़ के बीच एक दरार बनने लगी थी, लगा महमूद आज भी बच निकलेगा। महमूद आगे बढ़ा था। अचानक दूर से किसी ने एक पत्थर फेंका था जो ठीक महमूद के तमंचे पर जा लगा था। पत्थर से टकराकर तमंचा दूर फेंका गया था। महमूद का दिमाग सुन्न हो गया था। जान बचाने के लिए वह धीरे-धीरे उल्टे कदम पीछे लौटने लगा था। लोगों का हुजूम उसे चारो तरफ से घेरने लगा था। मौत बांटने वाला आज स्वयं मौत के घेरे में फंस चुका था। दस पंद्रह मिनट में ही जनता के त्वरित न्याय ने लंगड़ा महमूद का काम तमाम कर दिया था। मार इतनी पड़ी थी, कि उसकी शक्ल-सूरत भी पहचान के काबिल नही रही थी।
उधर लोगों की भीड़ ने जहां तक संभव हो सका सेठ जी के छितराए रूपये जमा कर, नौकरों के भरोसे पड़ी दुकान पर पहुंचा दिया था। सेठ जी को उनके कुटुम्ब रिक्शे पर लाद कर पहले ही सरकारी अस्पताल ले जा चुके थे। उनके जख्म से बहुत ज्यादा खून रिस चुका था। नाड़ी धीमी पड़ती जा रही थी। डाक्टरों ने सूई दवाईयां दे दी थी। खून देने का इंतजाम उस छोटी सी डिस्पेन्सरी में नहीं था, अतः उपस्थित डाक्टर ने सेठ जी को शीघ्रातिशीघ्र जिला अस्पताल ले जाने का मशविरा दिया था।
सेठ जी के रिश्तेदार आनन-फानन गाड़ी की व्यवस्था कर जिला अस्पताल के लिए रवाना हो गए थे।
उस छोटे शहर के लिए बीते दिन की वारदात एक बहुत बड़ी घटना थी। मानों एक शांत स्थिर तालाब में किसी ने बड़ा पत्थर फेंक दिया हो और उफनती लहरें, मछलियों, जीव-जंतुओं, कमल पत्तों, घास-पतवार एवं घाट सभी को झकझोर रही हों। आज़िम खां भी खबर सुनकर सन्न रह गए थे। सेठ जी को देखने, उनसे मिलने, हालचाल पूछने के लिए आज़िम बेताब होने लगेे थे। सेठ जी की पूरी जिन्दगी उनकी आंखों के सामने चलचित्र की भांति दिखने लगी थी। आज़िम खां को याद आए थे वे दिन जब उनकी बीबी सख्त बीमार थी, तब सेठ जी ने बिना कोई चीज गिरवी रखे और बिना ब्याज के उन्हें रूपये उधार दिए थे। एक जरूरतमंद को मदद करने की भावना के साथ-साथ सेठ जी यह भी जानते थे कि इस्लाम में ब्याज लेना कुफ्र माना जाता है।
होलिका दहन की शाम। जिला अस्पताल के मुर्दाघर के पास सफेद कपड़ों में लिपटी दोे लाशें पोस्टमार्टम के इन्तजार में पड़ी थी। एक कुख्यात अपराधी की और एक उसके अपराध के शिकार, एक हीरा समान व्यक्ति-दोनों की मृत काया-एक ही धरातल पर पड़ी थी। होलिका की शाम, नरसिंहावतार ने एक दुष्टा का वध किया था, पर बीते दिन के अपराधिक कांड में पापी एवं पुण्यात्मा दोनों सिधार गए थे। मौत ने दोनों इंसानों को एक-समान धरातल पर ला दिया।
अगला दिन, होली का दिन, रंगों का त्योहार पूरे कस्बे के लिए बदरंग हो चुका था। छोटे-छोटे बच्चे भी, समझ नहीं पा रहे थे, ‘आखिर क्या हुआ ?’। बड़ों में हर्ष-उल्लास की कमी छोटों पर भी मनहूसियत की काली छाया डाल रही थी। आसमान में छायी बदली और उदासी बढ़ा रही थी। दूसरी तरफ शहर में उन्माद फैलाने वालों की कमी नहीं थी। छुटभैया नेतागण इसे हिन्दु-मुसलमान का काला रंग देने में जुट गए थे। लोग बाग रंग-अबीर-गुलाल लगाने, एक-दूसरे को होली की मुबारक देने की बजाय, छोटे-छोटे झुंडों में खड़े हो खुसर-पुसर कर रहे थे।
सेठ रामनारायण के घर के बरामदे में सेठजी का शव अर्थी पर रख कर फूलों से सजाया जा चुका था। सगे-संबंधी, मित्र, पड़ोसी श्मशान घाट की ओर प्रस्थान करने की तैयारी में थे। घाट पर लकड़ी की व्यवस्था हो चुकने की खबर मिलते ही ‘‘राम नाम सत्य है’’ की बोली के साथ अर्थी अन्तिम यात्रा के लिए रवाना हो गई।
दूसरी तरफ महमूद की लाश ताबूत में बंद की जा चुकी थी। कब्र खोदे जाने की खबर मिलते ही, ज़नाज़ा कब्रिस्तान की ओर बढ़ने लगा।
कस्बे के दक्षिणी छोर पर पूरब में नदी किनारे श्मशान घाट था और पश्चिम में मस्जिद के बगल में कब्रिस्तान। दोनों जगह जाने के रास्ते आजिम धोबी के घर के पास के तिराहे से अलग होते हैं। आज बूढ़े आजिम इसी दोराहे पर खड़े थे। सेठ जी की अर्थी कुछ देर के लिए आजिम खां के दरवाजे के सामने रखी गयी। सभी जानते थे, सेठ जी आजिम को अपना धोबी नही, अपना हितैषी मानते थे।
मरहूम महमूद का ज़नाजा भी कुछ देर आज़िम के दरवाजे के सामने रखा गया और नमाज़े ज़नाज़ा पढ़ा गया। उसके बाद आज़िम का बेटा ज़नाज़े के साथ बढ़ गया। आज़िम ने श्मशान और कब्रिस्तान जाने वाली दोनों लाशों को दुआएं दी, पर उनके कदम किस तरफ बढ़ेंगे ...? उहापोह में डूब गए बुजुर्ग आज़िम खां !
आज़िम खां ने जिन्दगी भर अल्लाह की बन्दगी की थी। अपनी औकात के हिसाब से ज़कात दी थी और नमाज़ की पाबन्दी की थी। पैसे न जुटा पाने के कारण हज़ नही जा सके थे, पर दिल से सच्चे मुसलमान थे। वे मानते थे कि हर शख्स, जो ईमान धर्म का पालन करे, अच्छे कर्म करे और इन्सान की मदद करे, वह इस्लाम का बंदा है। जो सच्चाई के साथ खड़ा हो, इन्सानों का मददगार हो और अल्लाह की इबादत करे उसका ठिकाना ज़न्नत होगा। जो लोग ईमान वाले इंसानों को तकलीफ पहुंचाते हैं, सताते हैं, उन्हें अल्लाह की लानत लगेगी। झूठ बोलने वाले और गलत काम करने वाले जहन्नुम की आग में झोंके जाऐंगे। उनके विचार से कोई अपराधी, आततायी और आतंकवादी सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता।
उस दिन आजिम खां दर्जनों मुस्लिम अनुयायियों को एक गुनहगार के जनाजे में शामिल होते देख रहे थे, इसलिए कि वह अपराधी एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ था। पर आजिम खां के जेहन में सवाल उठ रहा था, कौन था वास्तव में इस्लाम धर्म का सही बंदा ...? इस्लाम की कसौटी पर कौन खड़ा उतरेगा ...? एक गुनाहगार या एक सच्चा इंसान...? किधर जाए वो ..?
आज़िम के कदम श्मशान घाट की तरफ बढ़ गये ...।
प्रदीप कुमार अग्रवाल
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