अखबारी बाबा (लघु कथा)
जाड़े की कनकनाती ठंड भरी रात, घंटो देर से चल रही अपनी रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म के ओवरब्रिज पर, हड़बड़ी में आते जाते लोगो को देखकर उकताते हुए समय बीता रहा था। रात के दस बजे भी पूरा स्टेशन भीड़, शोर-गुल और गहमा-गहमी से भरा हुआ था। सभी ट्रेने विलम्ब से चल रही थी।
पास से हाकर शोर लगाता गुजरा, ‘‘कल का अखबार, चार रूपये में ..., कल का ....’’ ओवरब्रिज की दूसरी रेलिंग के पास, जमीन पर अखबार बिछाए बैठे एक बुजुर्ग ने आवाज लगाई, ‘‘ऐ अखबार वाले ...’’ मेरी निगाह उन पर पड़ी। 65-70 की उम्र के, पर काठी से स्वस्थ दिख रहे बुजुर्ग के चेहरे पर झुर्रियां एक अजीब डिजाइन बना रहीं थीं। उन्होने साधारण साफ-सुथरा धोती-कुर्ता पहना था, साथ चेहरे पर मोटा चश्मा और सिर पर भूरे रंग की मंकी कैप की सजावट थी। पेपर लेकर उन्होने, हाॅकर को पांच रूपये का सिक्का दिया। हाॅकर के पास लौटाने के लिए एक रूपये का सिक्का नहीं था जिसके बदले, उन्होंने उस दिन का अखबार खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। यह बात और वह व्यक्तित्व कौतूहल जगाने लायक थी।
लगभग आधे धंटे में उन्होंने दोनों अखबारों की एक-एक पंक्ति, एक-एक खबरे, सारे पन्ने पढ़ लिए या कहें चाट गए। पठन-पाठन समाप्त कर, उन्होने अखबार के एक पन्ने पर मूड़ी-चना निकाला, तेल-नमक डाला, मिला कर आराम से खाया और झोले से पानी की बोतल निकाल दो-चार घूंट पानी पिया। अब बिस्तर लगाने का काम शुरू। बड़े ही करीने से अखबार के अलग किए पन्नो को एक दूसरे पर ओवरलेप कराते हुए पांच फीट लम्बी शय्या तैयार हो गयी। कुछ पल पूजन की मुद्रा में रहने के पश्चात् झोले से एक चादर निकाल कर पूरे देह-मुंह को ढंक लिया। खाली झोले को तकिया बना कर देखते ही देखते अखबारी बाबा गहरी नींद के आगोश में डूब गए। आसपास हो रहे शोर के बीच भी, उनकी खर्राटों की आवाज रह-रह कर मैं सुन पा रहा था।
इस विपन्नता में भी अखबारी बाबा के चेहरे पर एक आत्म संतोष का भाव देख मैं गहरे सोच में डूब गया। इन्होने निर्धनता को भी सहज रूप में ईश्वर का प्रसाद समझ कर आत्मसात् कर लिया। मैं कभी आस-पास चारो तरफ मोबाइल पर बाते करते चिड़चिड़ाते, झुंझलाते, गुस्साते लोगों के हुजूम को देख रहा था और कभी निर्विकार, तनावमुक्त निद्रा में लीन अखबारी बाबा को ...। और तभी हवा में आवाज गूंजी ... यात्रीगण कृपया ध्यान दें ... मेरी ट्रेन के आने की उद्घोषणा हो रही थी।
पास से हाकर शोर लगाता गुजरा, ‘‘कल का अखबार, चार रूपये में ..., कल का ....’’ ओवरब्रिज की दूसरी रेलिंग के पास, जमीन पर अखबार बिछाए बैठे एक बुजुर्ग ने आवाज लगाई, ‘‘ऐ अखबार वाले ...’’ मेरी निगाह उन पर पड़ी। 65-70 की उम्र के, पर काठी से स्वस्थ दिख रहे बुजुर्ग के चेहरे पर झुर्रियां एक अजीब डिजाइन बना रहीं थीं। उन्होने साधारण साफ-सुथरा धोती-कुर्ता पहना था, साथ चेहरे पर मोटा चश्मा और सिर पर भूरे रंग की मंकी कैप की सजावट थी। पेपर लेकर उन्होने, हाॅकर को पांच रूपये का सिक्का दिया। हाॅकर के पास लौटाने के लिए एक रूपये का सिक्का नहीं था जिसके बदले, उन्होंने उस दिन का अखबार खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। यह बात और वह व्यक्तित्व कौतूहल जगाने लायक थी।
लगभग आधे धंटे में उन्होंने दोनों अखबारों की एक-एक पंक्ति, एक-एक खबरे, सारे पन्ने पढ़ लिए या कहें चाट गए। पठन-पाठन समाप्त कर, उन्होने अखबार के एक पन्ने पर मूड़ी-चना निकाला, तेल-नमक डाला, मिला कर आराम से खाया और झोले से पानी की बोतल निकाल दो-चार घूंट पानी पिया। अब बिस्तर लगाने का काम शुरू। बड़े ही करीने से अखबार के अलग किए पन्नो को एक दूसरे पर ओवरलेप कराते हुए पांच फीट लम्बी शय्या तैयार हो गयी। कुछ पल पूजन की मुद्रा में रहने के पश्चात् झोले से एक चादर निकाल कर पूरे देह-मुंह को ढंक लिया। खाली झोले को तकिया बना कर देखते ही देखते अखबारी बाबा गहरी नींद के आगोश में डूब गए। आसपास हो रहे शोर के बीच भी, उनकी खर्राटों की आवाज रह-रह कर मैं सुन पा रहा था।
इस विपन्नता में भी अखबारी बाबा के चेहरे पर एक आत्म संतोष का भाव देख मैं गहरे सोच में डूब गया। इन्होने निर्धनता को भी सहज रूप में ईश्वर का प्रसाद समझ कर आत्मसात् कर लिया। मैं कभी आस-पास चारो तरफ मोबाइल पर बाते करते चिड़चिड़ाते, झुंझलाते, गुस्साते लोगों के हुजूम को देख रहा था और कभी निर्विकार, तनावमुक्त निद्रा में लीन अखबारी बाबा को ...। और तभी हवा में आवाज गूंजी ... यात्रीगण कृपया ध्यान दें ... मेरी ट्रेन के आने की उद्घोषणा हो रही थी।
अखबारी बाबा (विचार)
एक समृद्ध जीवन का स्वप्न देखना एवं पद-धन आदि के लिए प्रयास करना अनुचित नहीं है, पर क्या इस मूषक-दौड़ में संतोष और संतुष्टि के भाव का पूर्ण-त्याग उचित है ?
घड़ी पांच सौ की हो या पांच लाख की समय तो वही रहेगा। यात्रा स्लीपर क्लास में करें या फस्र्ट ए.सी. में, गंतव्य तो नहीं बदलेगा। क्या महंगे कुकिंग रेंज में खाना बेहतर पकेगा ? क्या महंगे डाइनिंग टेबुल और क्राॅकरी में खाने का स्वाद बदल जाएगा।
लगातार नई-नई जरूरतों का हौवा न खड़ा कर, ईश्वर के देय को, अपने मेहनत के फल को स्वीकार कर, एक स्तर पर संतुष्टि का भाव लाना हमारे जीवन को बेहतर बनाएगा।
घड़ी पांच सौ की हो या पांच लाख की समय तो वही रहेगा। यात्रा स्लीपर क्लास में करें या फस्र्ट ए.सी. में, गंतव्य तो नहीं बदलेगा। क्या महंगे कुकिंग रेंज में खाना बेहतर पकेगा ? क्या महंगे डाइनिंग टेबुल और क्राॅकरी में खाने का स्वाद बदल जाएगा।
लगातार नई-नई जरूरतों का हौवा न खड़ा कर, ईश्वर के देय को, अपने मेहनत के फल को स्वीकार कर, एक स्तर पर संतुष्टि का भाव लाना हमारे जीवन को बेहतर बनाएगा।
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