Saturday, 14 February 2015

Pasa palat gaya

पासा पलट गया 
‘‘सर, सर, महात्मा गाँधी रोड पर बैंक डकैती हो गई ..., तीन-चार गार्ड घायल हैं ..., अपना ही एरिया है ..., वायरलेस पर एस.पी. साहब की आवाज भी सुनाई पड़ रही थी...।’’
एक सिपाही के द्वारा तेजी से झकझोरे जाने से थानेदार साहब हड़बड़ाकर उठे।
लम्बा कद, गोरा रंग, घँुघराले बाल और आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थानेदार श्री प्रद्युमन ठाकुर की मुख्य रूचि तो साहित्य में थी। हिन्दी में एम.ए. करने के बाद कई कालेजों में व्याख्याता पद पाने का प्रयास किया, पर सारे पद विभागाध्यक्षों के भाई-भतीजों के लिए आरक्षित किए जा चुके थे। भला हो सरकार के द्वारा पुलिस में थोक में की जा रही बहालियों की, कि ठाकुर साहब को थानेदार की नौकरी मिल गई। इन्सान की किस्मत उसे कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है...! कहाँ साहित्य की सरल, श्रृंगारिक मानसिकता और कहाँ पुलिस की तिकड़म भरी नौकरी। ‘कि जिन्दगी इन्सान को बहुत कुछ सिखाती है’ और ‘थानेदार ठाकुर साहब ने जिन्दगी जीने और नौकरी करने के गुर तेजी से सीख लिए थे,’ यह बताने के लिए उस दिन की घटनाएँ ही पर्याप्त होगी ...
जाड़े की दुपहरी बेला। गाँधी मैदान थाने के पिछवाड़े बगीचे में गेंदे के लाल-लाल फूलों की क्यारियों पर नर्म धूप बिखरी पड़ी थी। थोड़ी दूर पर बहती गंगा नदी की धारा धीमी और लहरें शान्त थी। थानेदार प्रद्युमन ठाकुर आराम कुर्सी पर पैर लंबा फैलाए, अलसाए से लेटे हुए थे। बहुत दिनों बाद आज सुबह से उनके इलाके में किसी बड़ी अपराधिक वारदात की खबर नहीं मिलने से मन और मिजाज को कुछ चैन मिला था। हाजत में बंद एक अमीर तस्कर के द्वारा मंगाए गए पाॅल होटल का लजीज तन्दूर मुर्गा और कश्मीरी पुलाव खा कर थानेदार साहब तृप्त थे। डकार भी इलायची-केशर की सुगंध से भरी आ रही थी। एक तरफ गंगा की लहरों को छू कर उठती कुनकुनी हवा और दूसरी तरफ से सूरज की किरणों का उष्ण स्पर्श, दोनों मिलकर उनके देह, दिल और दिमाग पर तिलस्मी असर डाल रही थीं। मन ही मन गुनगुना रहे थे, ‘‘दिल ढूँढ़ता है..., फिर वही..., फुरकत के रात दिन...’’। वे तंद्रा और निंद्रा के सागर में उब-डूब कर रहे थे ..., कि डकैती की खबर आ गयी। 
थानेदार साहब की डाँट से बचने के लिए, सिपाही ने डकैती की पूरी खबर एक ही सांस में सुना दी और कोने में हाथ बांध खड़ा हो गया था। खबर सुनते ही थानेदार साहब की तंद्रा, निंद्रा, आलस्य, क्रोध ... सभी मनोभाव हवा में उड़ गए। थानेदार साहब सिपाही को भरपूर डांटना चाहते थे, पर मौके की नजाकत देखकर चुप लगा गए।
पिछले एक साल से अपराधियों ने उनके क्षेत्र में कोहराम मचा रखा था। पुलिस की जगजाहिर नाकामी के कारण गले की चेन, सेलफोन और घड़ी आदि छीनने की रपट तो आम जनता लिखवाने ही नहीं आती थी। पर चोरी, डाका, अपहरण एवं हत्या के मामले तो पूरी तरह रफा-दफा नहीं किए जा सकते थे। धीर-गंभीर थानेदार ठाकुर साहब ने दो चार गहरी सांस ली और ड्राइवर एवं आरक्षी टोली को शीघ्र तैयार होने का आदेश देकर गुसल की ओर कदम बढ़ाया। ... पाँच मिनट के अन्दर उनकी बड़ी गश्ती जीप पांच सशस्त्र आरक्षियों के साथ घटनास्थल की दिशा में कूच कर गई।
ड्राइवर ने जीप के उपर लगेे नारंगी फ्लैश लाइट को जला दिया और सायरन बजाते हुए पूरी गति से अन्य वाहनों को ओवरटेक करने का प्रयास शुरू किया। एक ही रास्ते पर पैदल, रिक्शा, ठेला, कार, जीप और स्कूल बसों के चलने से ट्रैफिक की गति ‘चींटी-चाल’ सी हो गई थी। रोड पर डिवाइडर बन जाने से सड़क की दूसरी तरफ से भी गाड़ी दौड़ाना संभव नहीं था। थानेदार साहब हड़बड़ी में बोले जा रहे थे, ‘‘जल्दी चल ऽऽ..., जल्दी चलाव ऽऽ...।’’ ड्राइवर था तो एक्सपर्ट पर दूसरी गाड़ियों के उपर से उछालकर ले जाना तो संभव नहीं था। मात्र दो किलोमीटर की दूरी तय करने में ही उन्हें बीस मिनट लग गए। वहाँ पहुंचने पर घटनास्थल का दृश्य देखकर थानेदार साहब भी हतप्रभ हो गए।
राजधानी के व्यस्ततम महात्मा गाँधी रोड पर स्थित नेशनल बैंक के मुख्य द्वार के सामने सैकड़ो तमाशबीनों की भीड़ एक वृहदाकार वृत बनाए खड़ी थी। द्वार के पास दो घायल संतरी कराह, छटपटा रहे थे; तीसरा गहरी चोट के कारण बेहोश पड़ा था और चैथा बदहवास, कभी एक के पास, कभी दूसरे के पास भाग रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था क्या करें, कैसे अपने घायल साथियों को मौत के मुँह में जाने से बचाए।
घटना स्थल पर एक-दो कैमरामैन पहुंच चुके थे। किसी न्यूज चैनल की ‘डिश एन्टेना’ लगी गाड़ी भी दिख रही थी। वे अपना कैमरा सेट करने में व्यस्त थे। मीडियाकर्मियों को तो अपने काम से काम था, घायलों को बचाने में उनकी कोई रूचि नहीं थी। जितनी बड़ी घटना या दुर्घटना होगी उतना ही बड़ा ‘न्यूज’ बनेगा। और अभी तो उन्हें ‘ब्रेकिंग न्यूज’ के लिए मसाला मिल रहा था।
खैर, थानेदार साहब ने आते ही स्थिति पर नियंत्रण पाने का प्रयास शुरू किया। सबसे पहले एक सिपाही को कहा, ‘‘नीचे गिरे रूपयों की गड्डियों को झोले में बटोर कर ड्राइवर साहब के पास रखो।’’
अन्य दो सिपाहियों को आदेश दिया, ‘‘एक-एक संतरी के साथ रिक्शा में बैठो और पाॅपुलर नर्सिंग होम मे ले जा कर इलाज कराओ। मेरा मोबाइल नंबर तो तुम्हारी डायरी में लिखा है। अगर मैनेजर या डाक्टर ना-नुकुर करें, तो तुरंत मुझसे बात कराना।’’
चैथे सिपाही को आदेश दिया, ‘‘तुम घटना का पूरा ब्यौरा लिखो। ध्यान रखो भीड़ इधर न आ पाए।’’ और तब बेहोश संतरी को एक सिपाही की मदद से गश्ती जीप में पीछे लिटाया।
तब तक दो ट्रैफिक पुलिस भी मोटरसाइकिल से घटना स्थल पर आ चुके थे और भीड़ को सड़क किनारे रखने का प्रयास करने लगे। थानेदार साहब ने एक ट्रैफिक पुलिस को मोटरसाइकिल पर आगे-आगे रास्ते साफ करते हुए बढ़ने को कहा, और पीछे-पीछे गश्ती जीप में बेहोश संतरी और उसके साथी को लेकर मेडिकल काॅलेज अस्पताल की ओर बढ़ निकले।
घटना स्थल पर भीड़ की तादाद सैकड़ों से बढ़कर हजारों तक पहुंच चुकी थी। दिनदहाड़े होती अपराधिक घटनाओं से जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा था। दबी जुबां में हो रहे आलोचना के स्वर बढ़कर, विरोध के नारों की शक्ल में बुलन्द होने लगे ..., ‘‘पुलिस-प्रशासन, हाय-हाय, हाय-हाय’’ ... ‘‘डी.एम., एस.पी. मुर्दाबाद-मुर्दाबाद’’ ... आदि-आदि।
घटना तो एक थी पर थानेदार साहब के सामने काम एवं समस्याएँ अनेक थीं। घायल संतरी का इलाज, घटना स्थल की रपट, अपराधियों की पहचान और खोजबीन, भीड़ पर नियंत्रण और जनता के आक्रोश को शांत करना ...। एक सक्षम योद्धा की भांति थानेदार साहब इन समस्याओं को सुलझाने में लग गये।
यातायात की समस्त बाधाओं के बावजूद घटना स्थल तेजी से पहुंच कर घायलों को हटा लेने का उनका पहला कदम तो सफल हो गया था। केवल एक चैनल का रिपोर्टर तड़पते घायलों की हृदय-विदारक तस्वीर लेने में कामयाब हो पाया था। संचार क्रांति के ये नये उपकरण, एक लचर व्यवस्था की शिकार पुलिस के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो रहे थे। जनता भी पुलिस को इत्तला करने के पहले न्यूज चैनल के सेलफोन पर खबर देने लगी थी। मीडिया की सक्रियता पुलिस के लिए परेशानी का सबब बन रही थी। आज भी कुछ वैसा ही हुआ, जबतक खबर कन्ट्रोल रूम पहुंच कर ‘वायरलेस’ पर रिले होता, टेलीविजन चैनल वाले अपने लाव-लश्कर के साथ घटना स्थल पर पहुंच चुके थे।
थानेदार साहब ने, अस्पताल पहंुचकर अपने संपर्को का इस्तेमाल करते हुए बेहोश संतरी को सीधे आपरेशन थियेटर में भिजवा दिया। छात्र जीवन के दौरान मेडिकल कालेज की कैंटीन में अड्डेबाजी करते रहने से, उस कैंपस में उनका चेहरा जाना पहचाना था। पुलिस केस के सिलसिले में डाक्टरों से उनकी भेंट मुलाकात भी होती रहती थी। आनन-फानन में डाक्टरों ने घायल संतरी की नाक में आॅक्सीजन और नस में दवा देने की नली लगा दी। थानेदार साहब को संतरी की जान बचाने के साथ-साथ अपनी तत्परता और पुलिस की सक्षमता सिद्ध करनी थी।
डाक्टरों को बेहोश संतरी की दिल की धड़कन तो मिल रही थी पर नब्ज बहुत कमजोर थी। वह सांस ठीक से नहीं ले पा रहा था। अपराधियों की एक गोली दाहिनी छाती में घुसकर फेफड़ों को छेद चुकी थी। पेट में लगी दूसरी गोली से खून रिस रहा था। रह-रह कर, वह मछली की तरह छटपटा रहा था।
संतरी के चोटों और ‘उल्टी सांस’ की स्थिति को देखकर डाक्टरों ने उसके बचने की संभावना नगण्य बता दी। फिर भी इलाज जारी रहा। ‘जब तक सांस-तब तक आस।’ मेडिकल कालेज के डाक्टर, इलाज में कोई कमी नहीं रखना चाहते थे, भले ही उन्हें इस प्रयास की निरर्थकता का पूरा आभास था। सभी प्राण रक्षक दवाएँ कोर्टिसोन और कोरामीन दी और सांस की नली में भी पाइप लगा कर आक्सीजन देना शुरू कर दिया। हाथ की नस में ग्लूकोज और ‘डोपामीन’ का घोल चढ़ने लगा। दस-दस मिनट पर ‘पल्स’ और ‘ब्लड प्रेशर’ नापा जाने लगा। आपरेशन की तैयारी शुरू कर दी गयी। जान बचाने के लिए फेफड़ों और पेट, दोनों चोट की शीघ्र मरम्मत जरूरी थी।
थानेदार साहब की गश्ती-जीप के वायरलेस सेट पर कन्ट्रोल रूम और एस.पी. साहब का ‘मैसेज’ बार-बार गूँज रहा था। घटनास्थल के आसपास जनता सड़क पर उतर आयी थी और जनाक्रोश बढ़ रहा था। सरकारी गाड़ी एवं पुलिसवाले अपनी पहचान छुपा कर भाग रहे थे। कौन जाने ..., भीड़ का गुस्सा किस पर उतर जाए। जनता यह मानने के लिए तैयार ही नहीं थी, कि पुलिस बल की संख्या, अस्त्र-शस्त्र एवं प्रशिक्षण इतने बड़े राज्य की कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपर्याप्त थे। राजनीतिज्ञों की दखलअंदाजी के कारण पुलिस का मनोबल भी गिरा हुआ था। बढ़ते अपराध की जिम्मेदारी पूरी तरह पुलिस की अक्षमता पर थोपी जा रही थी।
थोड़ी देर में कुछ न्यूज रिपोर्टर अपने माइक्रोफोन एवं कैमरा के साथ अस्पताल भी पहुंच गए और कभी डाक्टरों से, कभी तीमारदारों और वहाँ खड़े तमाशबीनों से बयान लेने लगे। माहौल बिगड़ने की संभावना दिखने लगी। डकैती की यह वारदात शहर की कानून व्यवस्था को धराशायी करने के लिये पर्याप्त साबित होती दिख रही थी। जनता की सोच में इन वारदातों के लिए पुलिस ही असली गुनहगार थी, न कि अपराधी। पुलिस के वरीय अफसर, ‘आई.जी’., ‘एस.एस.पी.’ आदि थानेदार साहब से संपर्क बनाए हुए स्थिति पर पैनी निगाह रखे हुए थे।
आपातकालीन कक्ष में तैनात डाक्टरों ने थानेदार साहब को संतरी की मरणासन्न अवस्था की वास्तविकता से अवगत करा दिया तथा सीनियर सर्जन डा. जे. के. सिंह को बुलाने के लिए ‘काॅल’ रजिस्टर पर घायल रोगी का बिस्तृत ब्यौरा लिख कर दिया। माना जाता था कि प्रख्यात सर्जन सिंह के हाथों में मरते रोगियों को बचा लेने की ताकत थी। डा. सिंह अपने समकक्ष डाक्टरों से कुछ ज्यादा ही स्वाभिमानी या अभिमानी थे। बिना सही प्रक्रिया के अस्पताल बुलाया जाना अपनी तौहीन समझते थे। रजिस्टर में लिखे ‘काॅल’ के साथ जब अस्पताल की गाड़ी उन्हें आवास से लाने जाती थी, तब ही वे अस्पताल आते थे-यह बात सर्वविदित थी। नेता, पुलिस और मरीजों के परिजनों की गाड़ी से वे परहेज करते थे।
थानेदार साहब ने शल्य कक्ष में जा कर बेहोश संतरी को देखा। संतरी की खुली पलकों से झांकती बड़ी-बड़ी आंखें छत के किसी बिन्दु पर स्थिर थी। दर्जनों दुर्घटनाओं, वारदातों और ‘एन्काउंटर’ की चश्मदीद गवाह, उनकी आँखें समझ गई कि आपरेशन टेबुल पर लेटे बेहोश संतरी को यमराज के चंगुल से कोई नहीं बचा सकता, चाहे डा. सिंह आएं या डा. प्रसाद, डा. मिश्रा या डा. धर्मराज।
जब तक अस्पताल का अर्दली ‘काॅल’ रजिस्टर ले कर अस्पताल की गाड़ी पर सवार होता, थानेदार साहब की गश्ती जीप डा. जे. के. सिंह के आवास की तरफ तेजी से रवाना हो गई। थानेदार साहब ने खुद डा. साहब के घर की ‘काॅलबेल’ दबायी, प्रणाम-पाती कर संक्षेप में घटना और बेहोश संतरी के बारे में बताया। उन्होंने डा. सिंह से हाथ जोड़कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, आप मेरे साथ तुरंत अस्पताल चलिए। आप के हाथ में जस है ..., जादू है। आप चलेंगे तो संतरी की जान जरूर बच जाएगी।’’
पर डाक्टर साहब तो थे, ‘नियम के पक्के’। उन्होंने थानेदार साहब की उम्मीद के मुताबिक, पुलिस जीप में जाने के अनुरोध को डाक्टर सिंह ने ठुकरा दिया। थानेदार साहब ने फिर कुछ देर विनती की, हाथ जोड़े, झुके, गिड़गिड़ाए और अंत में हार मानकर अस्पताल लौट गए।
अस्पताल वापस आकर थानेदार साहब ने जनता, उपस्थित अन्य डाक्टरों और मीडिया के सामने बयान दे दिया, ‘‘मैं खुद डाक्टर जे. के. सिंह को बुलाने उनके घर गया था, पर उन्होंनेे मेरी विनती ठुकरा दी..., पुलिस तो तत्परता से काम कर रही है, पर समाज का सहयोग नही मिल रहा है..., अपराध एवं उससे होने वाले नुकसान को कम करने में समाज की सहभागिता आवश्यक है...’’
जनता के मन में थानेदार साहब के प्रति सहानुभूति जग गई। लोग डाक्टर के अक्खड़पन की आलोचना करने लगे। मीडिया सारे घटनाक्रम का ‘आँखों-देखा-हाल’ प्रसारित कर राज्य और राष्ट्र को रूबरू करा रहा था। लोग-बाग पुलिस की लचरपन की कम और डाक्टरों की मनमानी की आलोचना ज्यादा करने लगे।
थोड़ी देर में अस्पताल की गाड़ी ‘काॅल रजिस्टर’ के साथ डा. जे. के. सिंह के निवास पर पहुंची। डा. सिंह तत्काल तैयार हो कर अस्पताल की ओर बढ़े...। इधर डा. सिंह की गाड़ी अस्पताल के द्वार पर आई, उधर बेहोश संतरी के प्राण-पखेरू उड़ गए। डा. जे. के. सिंह को अपनी काबिलियत दिखाने का मौका दिए बिना, संतरी सबको अलविदा कह कर वह दूसरी दुनिया को कूच कर गया।
डा. जे. के. सिंह को सामने देख, गुस्साई भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उन्हें डाँटने फटकारने लगी। कुछ धक्का-धुक्की और हाथापाई भी हुई। उनके विरूद्ध नारेबाजी और गाली-गलौज शुरू कर दी गई। आक्रोशित जनता के एक समूह ने उनके आवास के सामने जाकर नारेबाजी और पत्थरबाजी शुरू कर दी।
डा. जे. के. सिंह की सारी कानूनबाजी और अक्खड़पन गुम हो चुकी थी। अब वे ही थानेदार साहब के सामने करबद्ध खड़े, अपनी और परिवार की सुरक्षा की गुहार कर रहे थे। पासा पलट गया था। करबद्ध विनती की गुहार ठुकराने वाला स्वयं करबद्ध विनती करने को मजबूर था। शाम के धुधंलके में भी थानेदार साहब के होठों पर मंद-मंद मुस्कान तैर रही थी। उन्होंने डा. जे. के. सिंह को अपनी गश्ती जीप में दो सिपाहियों के बीच सुरक्षित बिठा दिया। चार बंदूकधारी आरक्षियों को उनके निवास की सुरक्षा के लिए रवाना किया।
शहर के विभिन्न थानों के दारोगा और सिपाही अपने-अपने इलाके में गश्त लगाने लगे। रात होते-होते पूरे शहर में शांति व्यवस्था कायम हो गई।
देर रात आई. जी. और सीनियर एस.पी. दोनों ने थानेदार साहब को फोन किया। उन्हें मामले को कुशलतापूर्वक निपटाने के लिए शाबासी दी, ‘‘वेरी टैक्टफुल हैंडलिंग’’, बताया राज्य के गृहमंत्री तुम्हारे मीडिया में दिए गए बयान की चर्चा कर रहे थे। और शीघ्र प्रमोशन का आश्वासन दिया।
और अगली सुबह अखबार के मुखपृष्ठ पर दो खबरें प्रमुखता से छपी थी ...
‘‘डाक्टरों की लापरवाही से बैंक-डकैती में घायल संतरी की मौत’’
‘‘बैंक-डकैती में तत्पर कार्रवाई के लिए थानेदार प्रद्युमन ठाकुर को राष्ट्रपति पदक देने की जनता द्वारा मांग।’’

Namaze janaza

नमाज़े ज़नाज़ा
सुबह दस बजे का समय। मुर्गे बांग दे कर शांत हो गये थे। सूरज की उष्मा घास-पत्तों की नोकों पर टिकी ओस सुखा चुकी थी। बच्चे स्कूल एवं लोग बाग काम पर जा चुके थे। पूरी गली में सन्नाटा छाया हुआ था। सन्नाटे को तोड़ती हुई दरवाजे पर सांकल की ठन-ठन की आवाज सुन बुजुर्ग धोबी आज़िम खां कुनमुनाए। दुबारा सांकल बजने पर उन्होंनेे धीरे-धीरे आंखें खोली। करवट बदलने की कोशिश की।
चार दिनों से बुखार की तपन एवं शरीर की पीड़ा से उबर कर इस रात ही थोड़ी नींद आई थी और वे देर सुबह तक सोते रह गये थे। चारों तरफ नजर दौड़ाई ..., घर खाली पड़ा था ... शायद बेटा-पतोहू कपड़े धोने गए हों। तिबारा ठन-ठन की आवाज आने पर किसी तरह कराहते हुए उठकर दरवाजा खोला। देखा, सामने सेठ रामनारायण का नौकर नन्दू हाथ में सफेद कपड़े का एक ढेर लिए हुए खड़ा था।
आज़िम खां को देखते ही नन्दू का चेहरा पीला पड़ गया, जैसे उसने कोई भूत देख लिया हो। कपड़े का ढेर उसके हाथ से गिर गया ..., लगा वह गश खाकर गिर पड़ेगा। कुछ पल दोनों एक दूसरे को एकटक देखते रहे। एक दूसरे की आंखों के भाव पढ़ने की कोशिश करते रहे। तब तक आज़िम का बेटा असगर पिछवाड़े से हाथ पोंछते आया ...
‘‘का बात है नन्दू ..., काहे के लिए आया है ..., ई कपड़ा कइसा है ... ?’’
नन्दू के हाथों में सफेद मलमल का ढेर देख असगर अचम्भित हो गया। धोबी के पास तो लोग धुलवाने के लिए गन्दे कपड़े लेकर आते हैं, नन्दू नया सफेद मलमल क्यों लाया ?
दरवाजे के इर्द-गिर्द खड़े तीनों शख्स एक दूसरे को चुपचाप सवालिया निगाहों से घूर रहे थे... और जानने की कोशिश कर रहे थे, आखिर बात क्या है ?
कुछ देर में नन्दू खुद को संभालते हुए असगर को थोड़ा अलग ले गया और फुसफुसाहट में बताया ...
‘‘शहर में खबर फैली है कि आज़िम अल्लाह को प्यारे हो गए। सेठ जी ने कफन का कपड़ा भेजा है ... आप तो जानते ही हैं, सेठ जी अपनों का कितना ख्याल रखते हैं ... सुबह-सुबह छोटे भाई से दुकान खुलवा कर मलमल का थान भिजवाया है।’’
बात तो फुसफुसाहट में हो रही थी, पर बोलने के लहजे से और पैरों के पास पड़े मलमल के ढेर को देखकर आज़िम खां सारा माज़रा समझ गए।
असगर ने अपनी खीज दबाते हुए नन्दू को मलमल लेकर, लौट जाने का इशारा किया।
आज़िम तो कुछ देर तक सन्न रह गए। फिर संभल कर कहा ...
‘‘अल्लाह के नाम से, जो बहुत रहीम और करीम है ..., हम बहुत खुशकिस्मत हैं ..., हमें जिन्दगी में ही पता लग गया, मेरी मौत के बाद मुझे कफन के कपड़े और एक पाक़ क़ब्र जरूर नसीब होगी। खुदा की रहमत मुझ पर जरूर बरसेगी। हे अल्लाह! मेरी कब्र की घबराहट को लगाव में बदल दे।’’
‘‘नन्दू, रामनारायण बाबू को मेरा शुक्रिया बोल देना, हे अल्लाह! दुनिया के पालनकत्र्ता मालिक उन्हें बरक्कत दे, जिन्दगी की हर खुशी उनके खानदान को मिले ... हमेे अपना समझा, तभी तो मेरी मौत की फ़कत अफवाह पर, कफन का कपड़ा और मय्यत के लिए रूपये भिजवाए।’’
यह वाकया हिन्दुस्तान के छोटे से कस्बे में हुआ, जो झारखंड की सीमा पर दो बरसाती नदियों के संगम पर स्थित था। भारत के हर गांव-कस्बे की भांति यहां भी कुछ पैसे वाले, कुछ कम पैसे वाले और कुछ निहायत गरीब रहते थे। पैसे वालों का पैसा भी उनकी व्यवसाय करने की पूंजी थी, न कि ऐश करने की राह। कस्बे में बसने वाले विभिन्न जातियों के हिन्दुओं और सुन्नी मुसलमानों के बीच एक अनूठा सामंजस्य बना हुआ था। कस्बे की मुख्य भूमि पर खेतों के मालिक, गौशाला के स्वामी, हिन्दु व्यवसायी और सिलाई कढ़ाई का थोक काम कराने वाले अमीर मुसलमान रहते थे। नदी किनारे हलवाई, किराने वाले और छोटे व्यवसायियों की घर-दुकनियाँ थी। नदी पार दूसरे तट पर कोईरी, चमार, धोबी आदि व्यवसाय वालों के झोपड़ों के अलग-अलग झुंड थे। सारी आबादी एक दूसरे पर किसी न किसी रूप में आश्रित थी और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का माहौल था। पर्यावरण की परिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम), जहां अस्तित्व के लिए बड़ा जानवर छोटे जानवर को अपना आहार बनाता है, उसका ठीक उल्टा परिवेश इस गंाव का था। यहां हर व्यक्ति एक दूसरे के अस्तित्व के लिए एक सहारा था, न कि उसका भक्षक। होली, दीवाली, दशहरा, मुहर्रम, ईद, बकरीद आदि त्योहारों पर गांव प्रेम एवं भाईचारे की तस्वीर बन जाता था, जो प्रायः गांव के नवोदित टूटपूंजिए नेताओं के आंख की किरकिरी बन जाता था।
सेठ रामनारायण इस गांव केे कपड़े के एक इज्जतदार व्यापारी थे। अभी उनकी उम्र साठ साल के आसपास है। चालीस साल पहले माँ की दी गई मात्र एक सौ रूपये की पूंजी से धोती-गमछा का गट्ठर माथे पर ढोकर, फेरीवाले के रूप में उन्होंने काम शुरू किया था। अपनी मेहनत, ईमानदारी और कम मुनाफा लेने की नीति से उनका धंधा बढ़ता गया और फेरी से गुमटी, फिर दूकान और अब आढ़त के मालिक हो गए। विवाह के बाद बच्चे-बच्चियां हुए, अब भरा पूरा परिवार हो गया। समाज में लोग बाग उनकी बातों-विचारों की कद्र करते थे। जिस शख्स की लगभग आधी उम्र गरीबी में गुजर जाए, कुछ धन धान्य होने के बाद भी उसे अपनी सुख-सुविधा और विलासिता की चाहत नही रहती।
आज़िम खां ने रामनारायण बाबू की किस्मत को अपनी आँखों के सामने पलटते देखा था, और उनकी मेहनत, ईमानदारी से बढ़ते हर कदम का चश्मदीद गवाह था। आज़िम सबसे कहते थे, ‘‘सेठ जी तो बिना फल की फिकर किए, सच्चा कर्म करते हैं। उनके लिए ईमान और परोपकार ही धन है। पिछले साल रोजगार में उन्हें थोड़ा बेहतर मुनाफा हुआ तो उन्होंने घोड़ा-गाड़ी नही खरीदी, बच्चों का स्कूल बनवा दिया। अल्लाह का करम उनपर सोने की बारिश करेगा ...।’’
देश, समाज, विचारधाराओं, जीवन सब में हो रहे बदलाव के साथ उस शांत गांव में भी नई-नई बातें होने लगी। दो नई बिरादरी-नेताओं की और अपराधियों की - पनपने लगी। नेताओं का मूल मंत्र, ‘‘बिल्लियों के झगड़ों में बन्दर को फायदा’’ कहानी की तरह था। जनता को आपस में लड़ाओ और फिर बीच-बचाव सुलह-सफाई कराते हुए राज करो। अपराधी सीधे-सादे मेहनतकश लोगों को डरा धमकाकर पैसे ऐंठने में लगे रहते थे और मौका मिलने पर लूट खसोट करना उनका धंधा था। दोनों के बीच अंदरूनी तालमेल और सांठगांठ भी थी।
सेठ रामनारायण जी के पास मेहनत और ईमानदारी की थाती थी, इसलिए वे न तो नेताओं से दबते थे, न ही अपराधियों से खौफ खाते थे। एक दो बार अपराधियों ने रंगदारी की मांग की भी, पर वे टाल गए थे, फिर भी अपराधियों के निशाने पर तो थे ही।
वह शाम होलिका दहन की पूर्व संध्या थी। शाम पांच बजे के आसपास, गोधूलि के समय। दिन में अच्छी बिक्री हुई थी पर शाम होते-होते बाजार में सन्नाटा छा गया था। सभी दुकानदार दुकान समेटने में लगे थे। कुछ देर पहले कुख्यात लंगड़ा महमूद दो-तीन गुर्गों के साथ नदी किनारे देखा गया था। एक दुमंजिले घर में डकैती के बाद छत से कूदने के कारण उसके पैर की हड्डी टूट गई थी। हड्डी तो जुट गई, पर पैर टेढ़ा हो गया और महमूद लंगड़ा कर चलता था। पुलिस दो-तीन साल से उसे पकड़ने की कोशिशें कर रही थी, पर ऐन मौके वह पुलिस को चकमा दे जाता था। आज उसका निशाना कौन होगा ?
कुछ देर में सेठ रामनारायण की दूकान पर चार अपराधी तमंचा ताने खड़े थे-
‘‘सेठ जी, रूपया-पईसा झोला में रख दीजिए’’
‘‘महमूद, गलत काम मत कर ..., जाओ यहां से ...’’
‘‘सेठ जी, पैसा देते हैं कि नहीं’’ ... कहते हुए महमूद ने देशी कट्टे से सेठ जी के पैरों पर गोली दाग दी थी। गोली जांघ में लगी थी। भगदड़ मच गई थी। सेठ जी की चीख और शोर-हंगामे के बीच महमूद के गुर्गो ने रूपयों को पास पड़े कपड़े में समेटा और भागने लगे थे।
अपराधी पैदल ही नदी की तरफ भाग रहे थे-शोरगुल सुनकर सामने बीसियों तमाशबीन जुट गए थे जिससे सामने का रास्ता लगभग बंद हो गया था। अपराधी उल्टी दिशा में दौड़े पर उधर और ज्यादा भीड़ जमा हो गयी थी। चारो अपराधी रूपयों का गट्ठर फेंक, तितर-बितर हो गए एवं अलग-अलग दिशा में भागने लगे थे। मजबूत पैर वाले तीन किशोर अपराधी तो किसी तरह भाग गए, पर घिर गया था लंगड़ा महमूद। लोगों ने महमूद पर ढेले-पत्थर फेंकना शुरू कर दिया था। किसी तरह भागते हुए वह कपड़ा-पट्टी से निकल लोहा-पट्टी की तरफ बढ़ गया था, पर वहां तो लोहे के कुदाल, बेलचा उसकी खातिरदारी में खड़े थे। महमूद ने कमर से तमंचा निकाला था और हवा में लहराते हुए भीड़ को ललकारा था,
‘‘खबरदार ..., दूर हट जाओ ..., नहीं तो, एक-एक को भून दूंगा ...।’’
धमकी सुनते ही भीड़ के बीच एक दरार बनने लगी थी, लगा महमूद आज भी बच निकलेगा। महमूद आगे बढ़ा था। अचानक दूर से किसी ने एक पत्थर फेंका था जो ठीक महमूद के तमंचे पर जा लगा था। पत्थर से टकराकर तमंचा दूर फेंका गया था। महमूद का दिमाग सुन्न हो गया था। जान बचाने के लिए वह धीरे-धीरे उल्टे कदम पीछे लौटने लगा था। लोगों का हुजूम उसे चारो तरफ से घेरने लगा था। मौत बांटने वाला आज स्वयं मौत के घेरे में फंस चुका था। दस पंद्रह मिनट में ही जनता के त्वरित न्याय ने लंगड़ा महमूद का काम तमाम कर दिया था। मार इतनी पड़ी थी, कि उसकी शक्ल-सूरत भी पहचान के काबिल नही रही थी।
उधर लोगों की भीड़ ने जहां तक संभव हो सका सेठ जी के छितराए रूपये जमा कर, नौकरों के भरोसे पड़ी दुकान पर पहुंचा दिया था। सेठ जी को उनके कुटुम्ब रिक्शे पर लाद कर पहले ही सरकारी अस्पताल ले जा चुके थे। उनके जख्म से बहुत ज्यादा खून रिस चुका था। नाड़ी धीमी पड़ती जा रही थी। डाक्टरों ने सूई दवाईयां दे दी थी। खून देने का इंतजाम उस छोटी सी डिस्पेन्सरी में नहीं था, अतः उपस्थित डाक्टर ने सेठ जी को शीघ्रातिशीघ्र जिला अस्पताल ले जाने का मशविरा दिया था।
सेठ जी के रिश्तेदार आनन-फानन गाड़ी की व्यवस्था कर जिला अस्पताल के लिए रवाना हो गए थे।
उस छोटे शहर के लिए बीते दिन की वारदात एक बहुत बड़ी घटना थी। मानों एक शांत स्थिर तालाब में किसी ने बड़ा पत्थर फेंक दिया हो और उफनती लहरें, मछलियों, जीव-जंतुओं, कमल पत्तों, घास-पतवार एवं घाट सभी को झकझोर रही हों। आज़िम खां भी खबर सुनकर सन्न रह गए थे। सेठ जी को देखने, उनसे मिलने, हालचाल पूछने के लिए आज़िम बेताब होने लगेे थे। सेठ जी की पूरी जिन्दगी उनकी आंखों के सामने चलचित्र की भांति दिखने लगी थी। आज़िम खां को याद आए थे वे दिन जब उनकी बीबी सख्त बीमार थी, तब सेठ जी ने बिना कोई चीज गिरवी रखे और बिना ब्याज के उन्हें रूपये उधार दिए थे। एक जरूरतमंद को मदद करने की भावना के साथ-साथ सेठ जी यह भी जानते थे कि इस्लाम में ब्याज लेना कुफ्र माना जाता है।
होलिका दहन की शाम। जिला अस्पताल के मुर्दाघर के पास सफेद कपड़ों में लिपटी दोे लाशें पोस्टमार्टम के इन्तजार में पड़ी थी। एक कुख्यात अपराधी की और एक उसके अपराध के शिकार, एक हीरा समान व्यक्ति-दोनों की मृत काया-एक ही धरातल पर पड़ी थी। होलिका की शाम, नरसिंहावतार ने एक दुष्टा का वध किया था, पर बीते दिन के अपराधिक कांड में पापी एवं पुण्यात्मा दोनों सिधार गए थे। मौत ने दोनों इंसानों को एक-समान धरातल पर ला दिया।
अगला दिन, होली का दिन, रंगों का त्योहार पूरे कस्बे के लिए बदरंग हो चुका था। छोटे-छोटे बच्चे भी, समझ नहीं पा रहे थे, ‘आखिर क्या हुआ ?’। बड़ों में हर्ष-उल्लास की कमी छोटों पर भी मनहूसियत की काली छाया डाल रही थी। आसमान में छायी बदली और उदासी बढ़ा रही थी। दूसरी तरफ शहर में उन्माद फैलाने वालों की कमी नहीं थी। छुटभैया नेतागण इसे हिन्दु-मुसलमान का काला रंग देने में जुट गए थे। लोग बाग रंग-अबीर-गुलाल लगाने, एक-दूसरे को होली की मुबारक देने की बजाय, छोटे-छोटे झुंडों में खड़े हो खुसर-पुसर कर रहे थे।
सेठ रामनारायण के घर के बरामदे में सेठजी का शव अर्थी पर रख कर फूलों से सजाया जा चुका था। सगे-संबंधी, मित्र, पड़ोसी श्मशान घाट की ओर प्रस्थान करने की तैयारी में थे। घाट पर लकड़ी की व्यवस्था हो चुकने की खबर मिलते ही ‘‘राम नाम सत्य है’’ की बोली के साथ अर्थी अन्तिम यात्रा के लिए रवाना हो गई।
दूसरी तरफ महमूद की लाश ताबूत में बंद की जा चुकी थी। कब्र खोदे जाने की खबर मिलते ही, ज़नाज़ा कब्रिस्तान की ओर बढ़ने लगा।
कस्बे के दक्षिणी छोर पर पूरब में नदी किनारे श्मशान घाट था और पश्चिम में मस्जिद के बगल में कब्रिस्तान। दोनों जगह जाने के रास्ते आजिम धोबी के घर के पास के तिराहे से अलग होते हैं। आज बूढ़े आजिम इसी दोराहे पर खड़े थे। सेठ जी की अर्थी कुछ देर के लिए आजिम खां के दरवाजे के सामने रखी गयी। सभी जानते थे, सेठ जी आजिम को अपना धोबी नही, अपना हितैषी मानते थे।
मरहूम महमूद का ज़नाजा भी कुछ देर आज़िम के दरवाजे के सामने रखा गया और नमाज़े ज़नाज़ा पढ़ा गया। उसके बाद आज़िम का बेटा ज़नाज़े के साथ बढ़ गया। आज़िम ने श्मशान और कब्रिस्तान जाने वाली दोनों लाशों को दुआएं दी, पर उनके कदम किस तरफ बढ़ेंगे ...? उहापोह में डूब गए बुजुर्ग आज़िम खां !
आज़िम खां ने जिन्दगी भर अल्लाह की बन्दगी की थी। अपनी औकात के हिसाब से ज़कात दी थी और नमाज़ की पाबन्दी की थी। पैसे न जुटा पाने के कारण हज़ नही जा सके थे, पर दिल से सच्चे मुसलमान थे। वे मानते थे कि हर शख्स, जो ईमान धर्म का पालन करे, अच्छे कर्म करे और इन्सान की मदद करे, वह इस्लाम का बंदा है। जो सच्चाई के साथ खड़ा हो, इन्सानों का मददगार हो और अल्लाह की इबादत करे उसका ठिकाना ज़न्नत होगा। जो लोग ईमान वाले इंसानों को तकलीफ पहुंचाते हैं, सताते हैं, उन्हें अल्लाह की लानत लगेगी। झूठ बोलने वाले और गलत काम करने वाले जहन्नुम की आग में झोंके जाऐंगे। उनके विचार से कोई अपराधी, आततायी और आतंकवादी सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता। 
उस दिन आजिम खां दर्जनों मुस्लिम अनुयायियों को एक गुनहगार के जनाजे में शामिल होते देख रहे थे, इसलिए कि वह अपराधी एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ था। पर आजिम खां के जेहन में सवाल उठ रहा था, कौन था वास्तव में इस्लाम धर्म का सही बंदा ...? इस्लाम की कसौटी पर कौन खड़ा उतरेगा ...? एक गुनाहगार या एक सच्चा इंसान...? किधर जाए वो ..?
आज़िम के कदम श्मशान घाट की तरफ बढ़ गये ...।
प्रदीप कुमार अग्रवाल

AKHBARI BABA

अखबारी बाबा (लघु कथा)
जाड़े की कनकनाती ठंड भरी रात, घंटो देर से चल रही अपनी रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म के ओवरब्रिज पर, हड़बड़ी में आते जाते लोगो को देखकर उकताते हुए समय बीता रहा था। रात के दस बजे भी पूरा स्टेशन भीड़, शोर-गुल और गहमा-गहमी से भरा हुआ था। सभी ट्रेने विलम्ब से चल रही थी।
पास से हाकर शोर लगाता गुजरा, ‘‘कल का अखबार, चार रूपये में ..., कल का ....’’ ओवरब्रिज की दूसरी रेलिंग के पास, जमीन पर अखबार बिछाए बैठे एक बुजुर्ग ने आवाज लगाई, ‘‘ऐ अखबार वाले ...’’ मेरी निगाह उन पर पड़ी। 65-70 की उम्र के, पर काठी से स्वस्थ दिख रहे बुजुर्ग के चेहरे पर झुर्रियां एक अजीब डिजाइन बना रहीं थीं। उन्होने साधारण साफ-सुथरा धोती-कुर्ता पहना था, साथ चेहरे पर मोटा चश्मा और सिर पर भूरे रंग की मंकी कैप की सजावट थी। पेपर लेकर उन्होने, हाॅकर को पांच रूपये का सिक्का दिया। हाॅकर के पास लौटाने के लिए एक रूपये का सिक्का नहीं था जिसके बदले, उन्होंने उस दिन का अखबार खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। यह बात और वह व्यक्तित्व कौतूहल जगाने लायक थी।
लगभग आधे धंटे में उन्होंने दोनों अखबारों की एक-एक पंक्ति, एक-एक खबरे, सारे पन्ने पढ़ लिए या कहें चाट गए। पठन-पाठन समाप्त कर, उन्होने अखबार के एक पन्ने पर मूड़ी-चना निकाला, तेल-नमक डाला, मिला कर आराम से खाया और झोले से पानी की बोतल निकाल दो-चार घूंट पानी पिया। अब बिस्तर लगाने का काम शुरू। बड़े ही करीने से अखबार के अलग किए पन्नो को एक दूसरे पर ओवरलेप कराते हुए पांच फीट लम्बी शय्या तैयार हो गयी। कुछ पल पूजन की मुद्रा में रहने के पश्चात् झोले से एक चादर निकाल कर पूरे देह-मुंह को ढंक लिया। खाली झोले को तकिया बना कर देखते ही देखते अखबारी बाबा गहरी नींद के आगोश में डूब गए। आसपास हो रहे शोर के बीच भी, उनकी खर्राटों की आवाज रह-रह कर मैं सुन पा रहा था।
इस विपन्नता में भी अखबारी बाबा के चेहरे पर एक आत्म संतोष का भाव देख मैं गहरे सोच में डूब गया। इन्होने निर्धनता को भी सहज रूप में ईश्वर का प्रसाद समझ कर आत्मसात् कर लिया। मैं कभी आस-पास चारो तरफ मोबाइल पर बाते करते चिड़चिड़ाते, झुंझलाते, गुस्साते लोगों के हुजूम को देख रहा था और कभी निर्विकार, तनावमुक्त निद्रा में लीन अखबारी बाबा को ...। और तभी हवा में आवाज गूंजी ... यात्रीगण कृपया ध्यान दें ... मेरी ट्रेन के आने की उद्घोषणा हो रही थी।
अखबारी बाबा (विचार)
एक समृद्ध जीवन का स्वप्न देखना एवं पद-धन आदि के लिए प्रयास करना अनुचित नहीं है, पर क्या इस मूषक-दौड़ में संतोष और संतुष्टि के भाव का पूर्ण-त्याग उचित है ?
घड़ी पांच सौ की हो या पांच लाख की समय तो वही रहेगा। यात्रा स्लीपर क्लास में करें या फस्र्ट ए.सी. में, गंतव्य तो नहीं बदलेगा। क्या महंगे कुकिंग रेंज में खाना बेहतर पकेगा ? क्या महंगे डाइनिंग टेबुल और क्राॅकरी में खाने का स्वाद बदल जाएगा।
लगातार नई-नई जरूरतों का हौवा न खड़ा कर, ईश्वर के देय को, अपने मेहनत के फल को स्वीकार कर, एक स्तर पर संतुष्टि का भाव लाना हमारे जीवन को बेहतर बनाएगा।

KHUDA hafiz

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mlds Bhd ikap feuV ckn tc m/kj fof”k’V fpfdRld jruyky th ds lEeku esa lHkkxkj rkfy;ksa dh xM+xM+kgV ls xwat jgk Fkk&HkkSth us Hkh mUgsa vkf[kjh vk”kh’k ns fn;kA

Mohe lagi lagan

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       lqcg gksrs&gksrs og iwjh rjg Fkddj fuBky gks x;kA ckjg ?kaVks ls Hkw[ks&I;kls vkSj N% ?kaVks ls Hkkxrs jgus ls mldh gkyr iLr gks jgh FkhA izkr%dkyhu Hkze.k djrs gq, xs:vk oL=/kkjh lU;kfl;ksaa ds ,d >qaM us cngokl uaxs iSj pyrs ulh:íhu dks ns[kkA mldh gkyr ns[k] mUgksus mls lehi iM+s ,d iRFkj ij fcBkdj uke&irk iwNus dh dksf”k”k dhA muds gj iz”u dk mÙkj ewd ckyd ulhj dh vka[kksa ls vfojy cgrs vkalw FksA nnZ] ihM+k ,oa “kksd ls ckyd dh ok.kh vo:) gks pqdh FkhA lU;kfl;ksa ds eqf[k;k us cPps dks <k<l nsrs gq,] vius lkfFk;ksa dks mls vkJe ys tkus vkSj Hkkstu djkus dk funsZ”k fn;kA r; gqvk fd cPpk “kkar gks tk,xk] rks iwNrkN dj mls mlds ek¡&cki ds ikl Hkst nsaxsA
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       esnkUrk vLirky ds ifjlj vkSj ykWch esa lSadM+ksaa vuq;kf;;ksa dh HkhM+ mudh ,d >yd ikus ds fy, meM+h gqbZ FkhA muds d{k ds ckgj dqN fxus&pqus ?kfu’B fe= ekStwn FksA vkijs”ku ds fu/kkZfjr oDr ij vLirky dk ifjpkjd mUgsa “kY; d{k esa ys tkus gsrw LVªspj yk;kA mlus Lokeh th dks iguus ds fy, /kqys oL= fn,A Lokeh us vius Hkxok fudky dj vLirky dk gjk oL= igu fy;kA ckgj fudyrs gq, viuk ycknk “kcue dks ns fn;k vkSj lkQk lquUnk ds gkFkksa ij j[k fn;kA vka[ks ewd Hkkouk,¡ O;ä dj jgh Fkh&^”kcue eq>s ekQ djuk ---] lquUnk esjh vekur j[kks ---A LVªspj ij ysV dj mUgksus gkFk tksM+ dj lHkh dks iz.kke fd;k vkSj vka[ks ewan yhA
       Lokeh th ewanh us=ksa ds lkFk “kY; d{k esa x, ---A rhu ?kaVs ckn ewanh vka[kksa ds lkFk gh mudk ikfFkZo “kjhj ckgj vk;kA
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