Where is GOD?
र्इश्वर की कथा
''चार हजार वर्ष पुरानी बात है, प्राचीन भारत में सतपुरा के घने जंगलों में वृक्ष गगनचुम्बी होते थे और वन के किनारे चम्बे नदी के तीर पर आदि-मानवों का समूह, पत्थरों, गुफाओं में बसता था। कुछ दूर उंचे पर्वतों की श्रृंखला थी, जिस पर पहुंचने का प्रयास करने वाला कोर्इ भी मानव आजतक लौटकर नही आया। प्रतिदिन सायं काल एक बड़ा से लाल गोला उन पर्वतों पर कुछ समय के लिए दिखता था, जिसे गांव वाले, 'सूर्य-फल कहते थे।
उन आदि मानवों का विश्वास था, उन पर्वतों के पीछे उनका सृजनकत्र्ता और भाग्यविधाता रहता है और भटक कर आए मानवों को अपनी सेवा के लिए रख लेता है (जबकि वे अति उत्साही मानव जंगली जानवरों के शिकार हो जाते थे)।
नदी तट पर बसे पुरूष-स्त्री, बच्चे वन से चुन कर लाये गए आम, जामुन, शरीफा फलों, कंद-मूलों से क्षुधा तृपित करते थे। आसपास विचरती गायों और बकरियों का दूध निकालना वे सीख चुके थे। उनमें दोस्ती-भार्इचारा था, तो साथ में कभी-कभी वर्चस्व के लिए द्वंद्व भी होता रहता था। ऐसी ही एक घमासान झगड़े में ताकतवरों के आदेश को एक मानव ने मानने से इन्कार कर दिया। दंडस्वरूप उसे पर्वत पर जाकर सूर्यफल लाने का आदेश दिया गया।
अगले दिन प्रात: दंडित व्यकित धीरे-धीरे पर्वतों की दिशा में बढ़ने लगा। भूखे-प्यासे दोपहर से शाम चलते-चलते वह उर्जाहीन, मूचिर्छत हो वह धरती पर गिर गया। उसने पूरी रात नाना प्रकार के दु:स्वपनों के साथ काटी। उसके भाग्य से अगले दिन प्रात: काल वर्षा होने से उसकी मूच्र्छा टूटी और वह बैठकर सोचने लगा। पर्वत पर उपर जाना उसके लिए संभव नही था, इसलिए मन मारकर वह धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। शाम होते-होते, उसके गांव के समीप आने पर गांव वाले उसके जीवित लौट आने पर आश्चर्यचकित हो उठे। सभी उसके सामने नतमस्तक हो गए। पूछे जाने पर उसने गांव वालों से बताया, वह र्इश्वर से मिला, जिसने उसे अपना दूत बना कर भेजा है और अब गांव में र्इश्वर का संदेश वही प्रेषित करेगा। उसकी जय-जयकार होने लगी। पूजा-वन्दना होने लगी। उसे फल-पुष्प, जल समर्पित किया जाने लगा ....।
क्या आप इस कथा पर विश्वास कर रहे हैं ? मुझे प्रतीत हो रहा है, नहीं। निशिचत ही आप सोच रहे हैं कि यह लेखक की कल्पना की उपज है। इसके सत्य होने का दावा न ही सिद्ध किया जा सकता है, न ही गैर साबित। जिस प्रकार उपरोक्त कथा कल्पना है उसी प्रकार र्इश्वर का असितत्व भी मानव के उर्वर मसितष्क की कल्पना की फसल है। र्इश्वर का असितत्व, स्वरूप, अवतार आदि सभी बातें मानव की कल्पना है। यह समूह बना कर मनुष्यों के द्वारा एक-दूसरे पर हावी-प्रभावी होने के प्रयास का प्रतिफलन है।
र्इश्वर की कथा
''चार हजार वर्ष पुरानी बात है, प्राचीन भारत में सतपुरा के घने जंगलों में वृक्ष गगनचुम्बी होते थे और वन के किनारे चम्बे नदी के तीर पर आदि-मानवों का समूह, पत्थरों, गुफाओं में बसता था। कुछ दूर उंचे पर्वतों की श्रृंखला थी, जिस पर पहुंचने का प्रयास करने वाला कोर्इ भी मानव आजतक लौटकर नही आया। प्रतिदिन सायं काल एक बड़ा से लाल गोला उन पर्वतों पर कुछ समय के लिए दिखता था, जिसे गांव वाले, 'सूर्य-फल कहते थे।
उन आदि मानवों का विश्वास था, उन पर्वतों के पीछे उनका सृजनकत्र्ता और भाग्यविधाता रहता है और भटक कर आए मानवों को अपनी सेवा के लिए रख लेता है (जबकि वे अति उत्साही मानव जंगली जानवरों के शिकार हो जाते थे)।
नदी तट पर बसे पुरूष-स्त्री, बच्चे वन से चुन कर लाये गए आम, जामुन, शरीफा फलों, कंद-मूलों से क्षुधा तृपित करते थे। आसपास विचरती गायों और बकरियों का दूध निकालना वे सीख चुके थे। उनमें दोस्ती-भार्इचारा था, तो साथ में कभी-कभी वर्चस्व के लिए द्वंद्व भी होता रहता था। ऐसी ही एक घमासान झगड़े में ताकतवरों के आदेश को एक मानव ने मानने से इन्कार कर दिया। दंडस्वरूप उसे पर्वत पर जाकर सूर्यफल लाने का आदेश दिया गया।
अगले दिन प्रात: दंडित व्यकित धीरे-धीरे पर्वतों की दिशा में बढ़ने लगा। भूखे-प्यासे दोपहर से शाम चलते-चलते वह उर्जाहीन, मूचिर्छत हो वह धरती पर गिर गया। उसने पूरी रात नाना प्रकार के दु:स्वपनों के साथ काटी। उसके भाग्य से अगले दिन प्रात: काल वर्षा होने से उसकी मूच्र्छा टूटी और वह बैठकर सोचने लगा। पर्वत पर उपर जाना उसके लिए संभव नही था, इसलिए मन मारकर वह धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। शाम होते-होते, उसके गांव के समीप आने पर गांव वाले उसके जीवित लौट आने पर आश्चर्यचकित हो उठे। सभी उसके सामने नतमस्तक हो गए। पूछे जाने पर उसने गांव वालों से बताया, वह र्इश्वर से मिला, जिसने उसे अपना दूत बना कर भेजा है और अब गांव में र्इश्वर का संदेश वही प्रेषित करेगा। उसकी जय-जयकार होने लगी। पूजा-वन्दना होने लगी। उसे फल-पुष्प, जल समर्पित किया जाने लगा ....।
क्या आप इस कथा पर विश्वास कर रहे हैं ? मुझे प्रतीत हो रहा है, नहीं। निशिचत ही आप सोच रहे हैं कि यह लेखक की कल्पना की उपज है। इसके सत्य होने का दावा न ही सिद्ध किया जा सकता है, न ही गैर साबित। जिस प्रकार उपरोक्त कथा कल्पना है उसी प्रकार र्इश्वर का असितत्व भी मानव के उर्वर मसितष्क की कल्पना की फसल है। र्इश्वर का असितत्व, स्वरूप, अवतार आदि सभी बातें मानव की कल्पना है। यह समूह बना कर मनुष्यों के द्वारा एक-दूसरे पर हावी-प्रभावी होने के प्रयास का प्रतिफलन है।
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