नालन्दा आश्रम - छोटी-छोटी, मीठी-मीठी यादें
इन्टरनेट के इस युग में, नोबा बन्धुओं की, विद्यालय में बिताए गए दिनों की यादें, विद्यालय के प्रति उनके अगाध प्रेम और दीवानगी की झलकें, फेसबुक के विभिन्न मुखड़ों (प्रोफाइल्स) पर निरन्तर दिखती रहती हैं। हाटियन, नोबा, नोबा-68 तथा नोबा-नालन्दा आदि फेसबुक प्रोफाइल्स को ंदेखकर लगता है लगभग सभी हाटियन ने प्रवास का हर दिन, हर पल, पूरी शिद्दत एवं पूरे लगाव के साथ जिया है। औरों की तरह, मेरा भी नेतरहाट प्रवास का हर दिन, एक नया दिन होता था, एक नयी आशा और उमंग से भरा यादगार दिन...।
विद्यालय में मेरा पहला दिन, या कहें पहली शाम 17 नवम्बर 1968 की शाम थी जब रांची से चलकर बस शाम 7 बजे मुख्य भवन के सामने लगी। कुछ समय वस्त्रादि लेने में बीता। हवा में गुनगुनी ठंड के साथ एक भीनी-भीनी मोहक सुगंधि तैर रही थी। उस सुगंधि जिसे मैंने पहली बार अनुभव किया, ने मेरी सांसों में प्रवेश कर एक अदभुत हर्षानुभूति दी। बाद में पता चला, वह खुशबू ‘रात की रानी’ की थी।
आश्रम में मेरी खिड़की के सामने फूलों से सजा उद्यान था, जिसे आश्रमाध्यक्ष श्रीमान् डी0 पी0 सिंह बड़ी मेहनत से निखार कर रखते थे। खिड़की से झांकते गहरे-हरे और टेस लाल रंग के यूफोर्बिया के फूल-पत्तों पर सुबह की रोशनी में चमकती ओस की बूंदें, सौन्दर्य की पराकाष्ठा थी।
आश्रम के आंगन के बीचो-बीच बोगेनबेलिया की बड़ी सी झाड़ थी। इसकी शाखाओं-पुष्पों में एक अजीब अनूठापन था। कुछ डालियों में सभी फूल गुलाबी, कुछ में सभी श्वेत और कुछ में मिश्रित फूल उगते थे। कुछ डालियों में ऐसे फूल उगते थे जिनके आधे पेटल गुलाबी और आधी सफेद होते थे। वैज्ञानिक संकर तकनीक का यह अनूठा कमाल था।
आश्रम के बगल की लाल मोरंग बिछी सड़क के दोनों बगल नील-पुष्प जकरंडा और केसरिया फूल गुलमोहर के वृक्ष थे। रास्ते में बिखरे नीले-नारंगी फूल, आसपास बिखरे अमलतास-कनेर के पीले फूल, कचनार की सफेद कलियां... अदभूत नजारा होता था। प्राचार्य-निवास शैले के प्रांगन में ‘लाफिंग’ और ‘वीपिंग’ विलों के वृक्षों के बीच पिटूनिया, जरबेरा, फ्लाक्स और नेस्टर्शियम की क्यारियां... क्या स्वर्ग का दृश्य कुछ भिन्न होता होगा!
प्रथम वर्ष में मन उदास होने या तबियत ठीक नहीं होने पर, माताजी की ढांढस बढ़ाने वाली बातें, ललाट पर ममतामय स्पर्श, साथ में बीमार बालक को सांत्वना के रूप में खीर की एक कटोरी... कभी-कभी हमें बीमार होने का नाटक करने को मजबूर कर देती थी।
बरसात के दिनों में कभी-कभी बादलों के रूई जैसे ढेर कमरे में घुस जाते थे। प्रकृति को इतने समीप से छूना अवर्णनीय अनुभव होता था। कभी-कभी सुबह से बारिश की झड़ी लग जाती..., आठ बजे के आस-पास सूचना आ जाती थी कि कक्षाएँ स्थगित रहेगी और सभी छात्र आश्रम में स्वाध्याय करेंगे। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं होता था, जब दस बजते-बजते बारिश बंद, खिली धूप और हम खेल के मैदान में...।
जाड़े के दिनों में आश्रम के बगल चीड़-वन में दरी बिछाकर, पुस्तकालय से लाई गई प्रेमचंद की कहानी-संग्रह या अश्क का लंबा उपन्यास पढ़ते हुए उंघना, झपकी लेना, सोना-जागना... और दूर से आती सुरीली ध्वनि...
‘‘जाड़ों की नर्म धूप..., आंगन में लेटकर
दिल ढूंढ़ता है..., फिर वही ............।’’
विद्यालय में मेरा पहला दिन, या कहें पहली शाम 17 नवम्बर 1968 की शाम थी जब रांची से चलकर बस शाम 7 बजे मुख्य भवन के सामने लगी। कुछ समय वस्त्रादि लेने में बीता। हवा में गुनगुनी ठंड के साथ एक भीनी-भीनी मोहक सुगंधि तैर रही थी। उस सुगंधि जिसे मैंने पहली बार अनुभव किया, ने मेरी सांसों में प्रवेश कर एक अदभुत हर्षानुभूति दी। बाद में पता चला, वह खुशबू ‘रात की रानी’ की थी।
आश्रम में मेरी खिड़की के सामने फूलों से सजा उद्यान था, जिसे आश्रमाध्यक्ष श्रीमान् डी0 पी0 सिंह बड़ी मेहनत से निखार कर रखते थे। खिड़की से झांकते गहरे-हरे और टेस लाल रंग के यूफोर्बिया के फूल-पत्तों पर सुबह की रोशनी में चमकती ओस की बूंदें, सौन्दर्य की पराकाष्ठा थी।
आश्रम के आंगन के बीचो-बीच बोगेनबेलिया की बड़ी सी झाड़ थी। इसकी शाखाओं-पुष्पों में एक अजीब अनूठापन था। कुछ डालियों में सभी फूल गुलाबी, कुछ में सभी श्वेत और कुछ में मिश्रित फूल उगते थे। कुछ डालियों में ऐसे फूल उगते थे जिनके आधे पेटल गुलाबी और आधी सफेद होते थे। वैज्ञानिक संकर तकनीक का यह अनूठा कमाल था।
आश्रम के बगल की लाल मोरंग बिछी सड़क के दोनों बगल नील-पुष्प जकरंडा और केसरिया फूल गुलमोहर के वृक्ष थे। रास्ते में बिखरे नीले-नारंगी फूल, आसपास बिखरे अमलतास-कनेर के पीले फूल, कचनार की सफेद कलियां... अदभूत नजारा होता था। प्राचार्य-निवास शैले के प्रांगन में ‘लाफिंग’ और ‘वीपिंग’ विलों के वृक्षों के बीच पिटूनिया, जरबेरा, फ्लाक्स और नेस्टर्शियम की क्यारियां... क्या स्वर्ग का दृश्य कुछ भिन्न होता होगा!
प्रथम वर्ष में मन उदास होने या तबियत ठीक नहीं होने पर, माताजी की ढांढस बढ़ाने वाली बातें, ललाट पर ममतामय स्पर्श, साथ में बीमार बालक को सांत्वना के रूप में खीर की एक कटोरी... कभी-कभी हमें बीमार होने का नाटक करने को मजबूर कर देती थी।
बरसात के दिनों में कभी-कभी बादलों के रूई जैसे ढेर कमरे में घुस जाते थे। प्रकृति को इतने समीप से छूना अवर्णनीय अनुभव होता था। कभी-कभी सुबह से बारिश की झड़ी लग जाती..., आठ बजे के आस-पास सूचना आ जाती थी कि कक्षाएँ स्थगित रहेगी और सभी छात्र आश्रम में स्वाध्याय करेंगे। हमारी खुशी का ठिकाना नहीं होता था, जब दस बजते-बजते बारिश बंद, खिली धूप और हम खेल के मैदान में...।
जाड़े के दिनों में आश्रम के बगल चीड़-वन में दरी बिछाकर, पुस्तकालय से लाई गई प्रेमचंद की कहानी-संग्रह या अश्क का लंबा उपन्यास पढ़ते हुए उंघना, झपकी लेना, सोना-जागना... और दूर से आती सुरीली ध्वनि...
‘‘जाड़ों की नर्म धूप..., आंगन में लेटकर
दिल ढूंढ़ता है..., फिर वही ............।’’
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