Sunday, 8 March 2015

Netarhat-My first lesson

नेतरहाट - मेरा पहला पाठ
नवम्बर 1968, नेतरहाट विद्यालय में मेरे प्रवे”ा का प्रथम सप्ताह। गणित के ”िाक्षक श्रीमान~ मलिक हबीब+ गुफरान जी ने कक्षा में ऐकिक नियमों पर आधारित प्र”न समझाए एवं दो-तीन पाठों के प”चात~ “ानिवार के दिन पुस्तक के 20 प्र”नों को गृहकार्य के लिए दे दिया था।
प्रथम वर्’ा के सभी छात्रों की भांति मैं भी घर की यादों में खोया-खोया सा था। गणित के प्र”न सरल थे। मैंने सोचा बाद में हल कर लूंगा। रविवार बीत गया, सोमवार को गृहकार्य की पुस्तिका जमा कर ली गयी, जिसमें मैंने बीस में से मात्र एक ही प्र”न हल किया था। यह गृहकार्य ही नवम्बर माह का मासिक मुल्यांकन था और दो दिनों बाद मेरे नेतरहाट जीवन का प्रथम मुल्यांकन मेरे प्रगति पत्र में अंकित हो गया, प्रयास-³, सफलता-³, नि’ठा-³।
प्रगति पत्र देख मैं सन्न हो गया। मेरे लिए यह स्थिति ‘सिर मुंडाते ही ओले पड़े’ समान थी। मैंने श्रीमान~ गुफरान जी से कहा कि मैं तो सभी प्र”न हल कर लेता। स्वाभाविक जवाब था, ‘‘तो आपने किया क्यों नहीं ? आपको तो बता दिया गया था कि इस माह का मुल्यांकन गृहकार्य से ही होगा। अब इसमें कुछ बदलना संभव नही है।’’
नेतरहाट विद्यालय के “ाुरूआती दौर में ही यह ‘जोर का झटका’ मेरे लिए बड़ा सबक बन गया और मैं हर गृहकार्य प्राथमिकता के तौर पर तत्परतापूर्वक करने लगा। “ाायद इसी अभ्यास के कारण माध्यमिक परीक्षा मेें सामान्य गणित के पत्र में मुझे 98 प्रति”ात अंक मिले।
नेतरहाट विद्यालय में सीखे गए इस ‘प्रथम-पाठ’ के कारण ही मैं किसी भी कार्य को अन्तिम समय-सीमा ¼डेड-लाईन½ से पहले करने का प्रयास करता हूँ, जिससे कई उलझनों एवं परे”ाानियों से बचा जा सके।
डा0 प्रदीप कुमार अगzवाल

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